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पुरंदर किला, रानी सइबाई को शिवाजी महाराज का अनमोल उपहार!

पुरंदर की विजय के बाद पूरा वाड़ा खुशी से झूम रहा था। देर रात राजे और रानी सईबाई को आखिर कुछ पल साथ बिताने का अवसर मिला।

बातों-बातों में आभूषणों का जिक्र हुआ, लेकिन राजे के मन में रानी सईबाई के लिए एक खास उपहार छिपा था।

सुभानमंगल के खजाने से मिली चाँदी की पैंजनियाँ देखकर रानी सईबाई भाव-विभोर हो गईं। मगर उनकी झंकार ने एक नई चिंता खड़ी कर दी।

आखिर राजे ने ये पैंजनियाँ क्यों चुनीं? और रानी सईबाई ने उन्हें पहनने से क्यों मना किया? पूरी कहानी आगे पढ़ें…


पिछले लेख में हमने पढ़ा कि फत्तेखान की सेना बिखर चुकी थी, लेकिन बाजी पासलकर ने विजय के बीच फिर रणभूमि में उतरकर ऐसा धावा बोला, जिसने युद्ध की दिशा बदल दी।

मुसेरखान का अंत हुआ और शत्रु भागने लगा। मराठा सेना ने बेलसर तक उसका पीछा किया।

लेकिन विजय के बाद लौटे सैनिकों के बीच एक पालखी ने राजे के चेहरे की खुशी छीन ली। उसमें बाजी लहूलुहान पड़े थे।

आखिरी क्षणों में बाजी ने राजे से सिर्फ एक इच्छा कही—‘हँसिए, राजे!’ आखिर उनकी वह आखिरी इच्छा क्या थी?


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पुरंदर की विजय के बाद वाड़े में उमड़ा आनंद

पुरंदर से लौटने के बाद पूरा दिन व्यस्तता में बीत गया था। सारा वाड़ा पुरंदर के वीरों से भरा हुआ था। आनंद और उत्साह उमड़ रहा था। सभी राजे से बातचीत करने के लिए आतुर थे।

आधी रात के करीब जाकर राजे को कुछ फुर्सत मिली। वे अपने महल में आए। रानी सईबाई महल में पहुँचीं। उस समय राजे वस्त्र बदलकर शय्या पर बैठे हुए थे। रानी सईबाई ने कहा,

‘आज तो कितनी भीड़ उमड़ पड़ी थी ! मां साहब की खुशी का तो कहना ही क्या !’

राजे हल्के से मुस्कुराए और बोले, ‘यह स्वाभाविक ही है। ऐसा अपनापन देखकर लगता है, जैसे जीवन सार्थक हो गया हो।’

आभूषणों की बात और राजे की मुस्कान

रानी सईबाई एक-एक करके अपने आभूषण उतारकर मंच पर रख रही थीं। मंच पर इकट्ठे हुए आभूषणों को देखकर राजे बोले,

‘सचमुच, स्त्रियों को आभूषणों का कितना शौक होता है !’

‘तो क्या हुआ ? आप भी गले में कंठी, कलाई में पोहची, कानों में चौकड़े और उँगलियों में अंगूठियाँ पहनते हैं। पुरुषों को भी आभूषणों का उतना ही शौक होता है।’

‘हमने हार मान ली ! अब तो बात खत्म हुई ?’

‘ऐसे हार मानकर नहीं चलेगा। आप विजय प्राप्त करके लौटे हैं। कम-से-कम आज तो आरती में कुछ अर्पित करना चाहिए था।’

राजे गंभीर होकर बोले, ‘सच कहूँ तो भूल ही गया।’

‘यह भी हार हुई !’

‘हाँ ! लेकिन हमारी नहीं, आपकी !’ कहते हुए राजे उठ खड़े हुए।

रानी सईबाई के लिए छिपा था एक अनमोल उपहार

उन्होंने मंच का दरवाजा खोला और उसमें से सोने का कमरपट्टा निकाल लिया। रानी सईबाई की ओर देखते हुए बोले,

‘अब आप ही बताइए। क्या यह कमरपट्टा आरती में अर्पित किया जा सकता था ? और वह भी चार लोगों के सामने ?’

रानी सईबाई प्रसन्न होकर उस कमरपट्टे को निहारने लगीं। राजे ने पूछा,

‘पसंद आया ?’

‘हाँ !’

‘बस इतना ही नहीं। एक और चीज़ हम रानी साहब के चरणों के लिए लाए हैं।’

‘क्या लाए हैं ?’

‘वह वहाँ, हमारी पगड़ी के नीचे देखो।’

पगड़ी के नीचे छिपा था रानी सईबाई के लिए खास तोहफा

रानी सईबाई ने जाकर पगड़ी उठाई। पगड़ी के नीचे चाँदी की दो सुंदर पैंजनियाँ रखी थीं।

‘कितनी सुंदर हैं !’ पैंजनियाँ उठाते हुए रानी सईबाई बोलीं। पैंजनियों से मधुर-सी झंकार हुई। राजे बोले,

‘सई, अगर बताऊँ तो हँसोगी !’

‘क्या हुआ ?’

‘हुआ यह कि सुभानमंगल के खजाने की गिनती पुरंदर पर चल रही थी। एक-एक आभूषण की गिनती करके अलग रखा जा रहा था। अचानक ये पैंजनियाँ सामने आ गईं। इन्हें देखते ही तुम हमारी आँखों के सामने आ खड़ी हुईं। सबकी नजर बचाकर हम कह बैठे—इन पैंजनियों को हमारे नाम पर खर्ची में डालकर अलग रख दो।’

राजे ने रानी सईबाई के पैरों में पैंजनियाँ देखनी चाहीं

रानी सईबाई भाव-विभोर होकर राजे की बातें सुन रही थीं। राजे बोले,

‘इतना पराक्रम हमने किया है ! अब यूँ ही खड़ी मत रहो। हमें तुम्हारे पैरों में ये पैंजनियाँ देखनी हैं।’

रानी सईबाई ने पैरों में पैंजनियाँ पहन लीं। राजे बोले,

‘तुम्हारे पैरों में ये पैंजनियाँ शोभा देती हैं।’

चार कदम चलने के बाद रानी सईबाई ठिठक गईं। वे बोलीं,

‘मैं नहीं पहनूँगी ये पैंजनियाँ।’

‘क्यों ?’

‘क्यों ? क्या ? आवाज होती है ना ! मां साहब क्या कहेंगी ?’

पैंजनियों की झंकार और राजे का मज़ेदार जवाब

‘कुछ नहीं कहेंगी ! बल्कि हमारी प्रशंसा करेंगी।’

‘किस बात के लिए ?’ रानी सईबाई ने पूछा।

रानी सईबाई की आँखों में आँखें डालकर राजे बोले,

‘इस बात के लिए कि हम अपनी लाड़ली बहू का इतनी सजगता से ध्यान रखते हैं।’

रानी सईबाई उनके निकट आ गईं। वे बोलीं,

‘मैं भी कितनी मूर्ख हूँ ! आप पहले ही थक चुके हैं। रात भी बीतने को आई है। अब सो जाना चाहिए।’

विजय की रात में साथ बिताए अनमोल पल

राजे ने रानी सईबाई का हाथ थामते हुए कहा,

‘सई, जीवन में कुछ दिन ऐसे आनंद के आते हैं कि उस समय दिन-रात का भी भान नहीं रहता। आज का दिन भी वैसा ही है।’

रानी सईबाई ने महल में जल रही हजारों समइयों की ज्योतियाँ बुझानी शुरू कर दीं। अब केवल एक समई जल रही थी। वातावरण में हल्की ठंडक थी। समई का हल्का प्रकाश पूरे महल में फैल रहा था।


उस रात का अगला रहस्य!

पुरंदर की विजय के बाद राजे और रानी सईबाई के बीच बीती वह रात केवल प्रेम और आनंद की नहीं थी।

पैंजनियों की मधुर झंकार के पीछे छिपी भावना और भी गहरी थी।

क्या इस विजय के बाद राजे के जीवन में कोई नया मोड़ आने वाला था?

पूरी कहानी आगे पढ़िए और जानिए उस रात के अनकहे भावों का रहस्य…


प्रमुख पात्र और उनका परिचय

  • छत्रपति शिवाजी महाराज – पुरंदर की विजय के बाद रानी सईबाई के लिए विशेष उपहार लाने वाले संवेदनशील और प्रेमपूर्ण पति।
  • रानी सईबाई – शिवाजी महाराज की पत्नी, जो उनके स्नेह और उपहार से भाव-विभोर हो जाती हैं।
  • मां साहब – शिवाजी महाराज के जीवन में अनुशासन, संस्कार और मार्गदर्शन का महत्वपूर्ण आधार।

पुरंदर विजय का ऐतिहासिक महत्व

यह प्रसंग पुरंदर विजय के बाद के वातावरण को भावनात्मक रूप से सामने लाता है। सुभानमंगल के खजाने से मिली पैंजनियों के माध्यम से शिवाजी महाराज और रानी सईबाई के वैवाहिक संबंध में मौजूद स्नेह, सम्मान और आत्मीयता का चित्रण होता है।


इस लेख से मिलने वाली प्रमुख सीख

  • बड़ी विजय और कठिन संघर्षों के बीच भी अपने प्रियजनों के लिए समय निकालना रिश्तों को मजबूत बनाता है।
  • यह प्रसंग बताता है कि सच्चे स्नेह की पहचान महंगे उपहारों से नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपी भावना और अपनापन से होती है।

विजय के बीच स्नेह की अनमोल कहानी

पुरंदर की विजय ने राजे को गौरव दिया, लेकिन रानी सईबाई के लिए लाई गई पैंजनियों ने उस रात को भावनाओं से भर दिया। यह प्रसंग शिवाजी महाराज के जीवन का एक आत्मीय पक्ष दिखाता है।


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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

शिवाजी महाराज ने रानी सईबाई को क्या उपहार दिया था?

शिवाजी महाराज ने रानी सईबाई के लिए सोने का कमरपट्टा और चाँदी की सुंदर पैंजनियाँ रखी थीं। पैंजनियाँ उन्हें सुभानमंगल के खजाने में मिली थीं।

पैंजनियाँ देखकर रानी सईबाई ने उन्हें पहनने से क्यों मना किया?

पैंजनियों की आवाज सुनकर रानी सईबाई को चिंता हुई कि मां साहब उनकी झंकार सुन लेंगी। इसी कारण उन्होंने पैंजनियाँ पहनने में संकोच किया।

पैंजनियों को देखकर शिवाजी महाराज को रानी सईबाई की याद क्यों आई?

सुभानमंगल के खजाने की गिनती के दौरान पैंजनियाँ सामने आते ही उन्हें रानी सईबाई की याद आई। उन्होंने सबकी नजर बचाकर उन पैंजनियों को रानी सईबाई के लिए अलग रखवा दिया।