
सुभानमंगल की प्राचीरों के नीचे कावजी मल्हार की सेना जमा हुई… और सुबह होते ही युद्ध का बिगुल बज उठा।
तीरों, पत्थरों और अंगारों की बारिश के बीच मराठा वीर किले की दीवारें तोड़ने लगे। फिर आया वह पल, जब बाळाजी हैबतराव कावजी के सामने पड़ गया।
किले पर भगवा लहराया, लेकिन यह विजय अंत नहीं थी। अब फत्तेखान अपनी विशाल सेना लेकर पुरंदर की ओर बढ़ रहा था।
क्या कावजी की विजय के बाद पुरंदर भी बच पाएगा? पूरी कहानी आगे पढ़ें और जानिए इस निर्णायक युद्ध में क्या हुआ।
पिछले लेख में हमने पढ़ा कि पुणे पर संकट मंडरा रहा था। पुरंदर किले पर युद्ध की तैयारी पूरी हो चुकी थी, लेकिन राजे जानते थे कि असली परीक्षा अभी बाकी है।
खान का सरदार बाळाजी हैबतराव शिरवळ की सुभानमंगल गढ़ी में जा पहुँचा। अब स्वराज्य की पहली बड़ी टक्कर सामने थी।
राजे ने यह जिम्मेदारी कावजी मल्हार को सौंपी। अमावस्या की घनी रात में कावजी अपने वीरों के साथ चुपचाप किले से निकल पड़ा।
आखिर उस अंधेरी रात में कावजी के साथ क्या हुआ? क्या स्वराज्य को अपनी पहली विजय मिलने वाली थी? पूरी कहानी पढ़ें और जानिए उस निर्णायक मुठभेड़ की सच्चाई
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सुभानमंगल की ओर कावजी मल्हार का प्रस्थान
किले के नीचे कावजी मल्हार की सेना जमा होने लगी। भोर तक पूरी सेना जुट गई और सुबह होते ही लगभग छह कोस दूर स्थित सुभानमंगल की गढ़ी की ओर सेना ने प्रस्थान किया।
मराठों को अपनी ओर आते देखकर शिरवळ की आदिलशाही सेना भी सुभानमंगल की गढ़ी की ओर सहायता के लिए दौड़ पड़ी। शिरवळ को खाली देखकर कावजी के भीतर जोश भर उठा। वह अपने साथियों और पूरी सेना के साथ सुभानमंगल के किले पर टूट पड़ा।
किले की मजबूत प्राचीर और मराठों का हमला
गढ़ीनुमा किला, मिट्टी की मजबूत प्राचीर, नाले जैसा खंदक। कावजी अपनी सेना के साथ प्राचीर तक जा पहुँचा। तट को देखकर भिमाजी वाघ ने कहा,
‘कावजी, प्राचीर पर सीढ़ियाँ…’
‘अरे बाघ ! ऐसी प्राचीर के लिए सीढ़ियों की क्या जरूरत ? यह कोई लंका थोड़े ही है ! दीवारें गिरा दो।’
किले के ऊपर से यह दृश्य देख रहे हशमों के सिर तीरों की बौछार से छलनी होने लगे। सुभानमंगल की प्राचीरों को लोहे की सलाखों और कुदालों से खोदा जाने लगा। किले के मुख्य द्वार पर स्वयं कावजी पूरी ताकत से धक्के मार रहा था।
पत्थरों और अंगारों के बीच भयंकर युद्ध
किले के ऊपर से बड़े-बड़े पत्थर नीचे बरस रहे थे। जलते हुए अंगारों की वर्षा हो रही थी। भयभीत हशम तो बैलगाड़ी के पहिए, मुसल और यहाँ तक कि बेलन तक उठाकर नीचे फेंक रहे थे।
बाळाजी के साथ आए सरदार फाजलशहा और अशफशहा भय से व्याकुल होकर किले के भीतर इधर-उधर भाग रहे थे।
टूटा किले का दरवाजा और गूँजा हर हर महादेव
किले का दरवाजा गिर गया। खिंडार से लेकर सीढ़ियों तक ‘हर हर महादेव !’ की गर्जना गूँज उठी। किले के भीतर घमासान मच गया। किले के मकान आग की लपटों में घिर गए और धुएँ के घने गुबार सुभानमंगल के ऊपर उठने लगे। चारों ओर हाहाकार मच गया।
भिमा वाघ, भिकाजी चोर और घाटगे जैसे वीर आवेश के साथ शत्रुओं का सफाया करते हुए आगे बढ़ रहे थे। प्रतिरोध हर क्षण कम हो रहा था।
कावजी की नजर बाळाजी हैबतराव पर पड़ी
अचानक कावजी की नजर बाळाजी हैबतराव पर पड़ी। कावजी को देखते ही बाळाजी भागने लगा। कावजी ने अपना भाला संभाला और उसके पीछे दौड़ पड़ा। बाळाजी अभी बुर्ज तक पहुँचने का प्रयास ही कर रहा था कि भाला छूट गया। बाळाजी धराशायी हो गया।
उसके मारे जाने की खबर से शत्रु सैनिकों में भगदड़ मच गई। कुछ ही समय में किला अधिकार में आ गया।
सुभानमंगल पर लहराया भगवा
संध्या होते-होते सुभानमंगल की प्राचीर पर भगवा लहराने लगा। राजाओं को विजय का समाचार मिला।
सुभानमंगल की खुदाई का काम रात होने के बाद भी जारी रहा। भोर होते ही लूट का सारा सामान इकट्ठा करके कावजी पुरंदर की ओर रवाना हुआ। इस लूट में अनेक घोड़े, हाथी, बहुमूल्य आभूषण, वस्त्र, पालखियाँ और शस्त्र शामिल थे।
विजय के बाद राजाओं ने कावजी को दी शाबाशी
राजाओं के सामने विजय की सारी लूट रखकर वीर उनके समक्ष खड़े थे। राजाओं के आनंद की कोई सीमा नहीं थी। उन्होंने कहा,
‘शाबाश, कावजी ! स्वराज्य के पहले रणक्षेत्र को गूँजा दिया। अब फत्तेखान बिल से निकले नाग की तरह खळत-बेलसर छोड़कर पुरंदर पर चढ़ाई करेगा। तुम्हारे आजमाए हुए हाथ अब फत्तेखान के विरुद्ध काम आएँगे।’
फत्तेखान पुरंदर की ओर बढ़ा
राजाओं का अनुमान बिल्कुल सही निकला। शिरवळ की खबर मिलते ही फत्तेखान खळत-बेलसर से सेना लेकर पुरंदर की ओर निकल पड़ा और किले के नीचे आ पहुँचा।
फत्तेखान की सेना किले पर चढ़ाई करने लगी। सेना के पीछे स्वयं फत्तेखान था। बाईं ओर निंबाळकर और दाईं ओर घाटगे मोर्चा संभाले हुए थे। राजे स्वयं बुर्ज पर खड़े होकर निरीक्षण कर रहे थे। बाजी पासलकर तट के किनारे से मोर्चों की स्थिति देख रहे थे।
पुरंदर पर गूँजी तोप और हर हर महादेव
जैसे ही शत्रु सैनिक तीरों की मार की सीमा में पहुँचे, किले से तोप गरजी। उसी क्षण ‘हर हर महादेव !’ की गर्जना के साथ सैनिक किले से बाहर निकल पड़े।
प्राचीर पर चढ़ने का प्रयास कर रहे शत्रुओं पर बंदूकों और गोफणों से पत्थरों की लगातार बौछार होने लगी। विशाल पत्थर भी किले की ऊँचाई से शत्रु सेना पर बरसने लगे।
पुरंदर पर मंडराया युद्ध का खतरा
कावजी की विजय के बाद फत्तेखान विशाल सेना लेकर पुरंदर पहुँच चुका था।
अब राजे और उनके वीरों के सामने नई चुनौती खड़ी थी।
क्या पुरंदर की मजबूत प्राचीर शत्रु का आक्रमण रोक पाएगी?
आगे पढ़िए, जब स्वराज्य के वीरों ने फत्तेखान को युद्धभूमि में चुनौती दी।
प्रमुख पात्र और उनका परिचय
- कावजी मल्हार – सुभानमंगल की लड़ाई में मराठा सेना का नेतृत्व करने वाले वीर सेनानायक।
- बाळाजी हैबतराव – सुभानमंगल की गढ़ी से जुड़ा आदिलशाही पक्ष का प्रमुख योद्धा।
- भिमा वाघ – कावजी के साथ युद्ध में वीरता से लड़ने वाले मराठा योद्धा।
- भिकाजी चोर – सुभानमंगल के युद्ध में शत्रुओं के विरुद्ध लड़ने वाले वीर।
- फत्तेखान – सुभानमंगल की हार के बाद पुरंदर की ओर बढ़ने वाला आदिलशाही सेनापति।
- बाजी पासलकर – पुरंदर की रक्षा व्यवस्था का निरीक्षण करने वाले प्रमुख मराठा सरदार।
- निंबाळकर और घाटगे – फत्तेखान की सेना के साथ मोर्चा संभालने वाले सरदार।
सुभानमंगल विजय
सुभानमंगल की विजय ने मराठा शक्ति के बढ़ते प्रभाव को दिखाया। कावजी मल्हार के नेतृत्व में मिली इस सफलता के बाद फत्तेखान ने पुरंदर की ओर कूच किया, जिससे संघर्ष और अधिक निर्णायक हो गया।
इस युद्ध से मिलने वाली सीख
- सुभानमंगल का युद्ध सिखाता है कि साहस, रणनीति और नेतृत्व कठिन परिस्थितियों में भी विजय का मार्ग बना सकते हैं।
- सीमित साधनों के बावजूद दृढ़ संकल्प युद्ध का रुख बदल सकता है।
विजय के बाद शुरू हुई नई चुनौती
सुभानमंगल पर भगवा लहराने के बाद मराठों के सामने पुरंदर की रक्षा की चुनौती थी। फत्तेखान की सेना अब किले के सामने थी और निर्णायक संघर्ष शुरू हो चुका था।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
सुभानमंगल की गढ़ी पर हमला किसने किया?
सुभानमंगल की गढ़ी पर कावजी मल्हार के नेतृत्व में मराठा सेना ने हमला किया। युद्ध के बाद किले पर मराठों का अधिकार हो गया।
सुभानमंगल के युद्ध में बाळाजी हैबतराव का क्या हुआ?
युद्ध के दौरान कावजी मल्हार की नजर बाळाजी हैबतराव पर पड़ी और उसका पीछा किया गया। वर्णित घटनाक्रम के अनुसार बाळाजी मारा गया और इसके बाद शत्रु सेना में भगदड़ मच गई।
सुभानमंगल की विजय के बाद क्या हुआ?
सुभानमंगल की हार की खबर मिलते ही फत्तेखान सेना लेकर पुरंदर की ओर बढ़ा। इसके बाद पुरंदर के नीचे मराठों और फत्तेखान की सेना के बीच संघर्ष शुरू हुआ।