
बाग की सुंदरता और परिवार की खुशियों के बीच अचानक बाजी पासलकर ऐसी खबर लेकर आते हैं, जो आने वाले संघर्ष का संकेत देती है।
आदिलशाही ने शिवाजी राजे का सामना करने के लिए फत्तेखान को भेज दिया था। अब सवाल था—क्या राजे इस चुनौती के लिए सचमुच तैयार थे?
शिवाजी राजों की आँखों में आत्मविश्वास था, लेकिन बाजी की चिंता कुछ और ही कहानी कह रही थी। पिछले लेख में जहाँ कहानी रुकी थी, वहीं से आगे की रोमांचक कहानी पढ़ें।
पिछले लेख में?
पिछले लेख में हमने पढ़ा कि फिरंगोजी के सामने एक बड़ा सवाल था—क्या वे सत्ता के आगे झुकेंगे, या स्वराज्य का साथ देंगे?
शिवाजी राजों ने उन्हें धर्म, सम्मान और स्वतंत्रता की सच्चाई दिखाई। फिरंगोजी का मन बदल गया।
लेकिन यह निर्णय आसान नहीं था। एक ओर आदिलशाही की ताकत थी, तो दूसरी ओर स्वराज्य का सपना।
कहानी पढ़ें और जानें, फिरंगोजी ने शिवाजी राजों का साथ क्यों चुना?
लेख का विस्तृत सारांश
३-१
सुबह का सुहाना आरंभ और रानी सईबाई का स्नेह
सुबह राजों की आँख खुली। उजाला फैल चुका था। महल में सुगंध घुली हुई थी। पलंग के पास खड़ी रानी सईबाई को राजे देख रहे थे। रानी सईबाई ने अपने आँचल में सहेजकर लाई हुई मोगरे की कलियाँ पलंग पर सजानी शुरू कर दीं। राजे उठकर बैठ गए। रानी सईबाई ने पूछा,
‘हमने आपको जगाया तो नहीं ?’
‘नहीं ! उलटे, मांगकर भी नहीं मिलेगी, ऐसी सुहानी जाग मिली। इतने सारे फूल कौन लेकर आया ?’
‘किसी ने नहीं दिए। अपने ही बाग के हैं।’
‘इतने सारे ?’
‘केशव माली ने कितनी सुंदर बाग सँवारी है ! लेकिन आप देखने आएँ, तब न !’
‘अगर आप कहती हैं, तो चलें ?’
‘सच में ? चलिए न !’
राजे उठते हुए बोले,
‘चलिए, चलते हैं।’
रानी सईबाई चकित रह गईं। उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ। वे देखती रहीं। राजों ने पूछा,
‘क्या हुआ ?’
‘विश्वास ही नहीं हो रहा ! किसी को लगेगा कि जो कहा जाए, आप मान लेते हैं।’
‘मानना ही पड़ेगा ! कर भी क्या सकते हैं ?’
‘क्यों ?’
‘मां साहब का आदेश है कि आपका विशेष ध्यान रखा जाए।’
रानी सईबाई लज्जित हुईं।
राजों ने कुल्ला किया और फिर बाग की ओर चल पड़े।
मोगरे की क्यारियों में राजों की प्रसन्नता
मोगरे की क्यारियाँ देखकर राजे प्रसन्न हो उठे। राजों को स्वयं बाग में आया देखकर वृद्ध केशव माली दौड़ता हुआ उनके पास आया। अभिवादन करके खड़ा हो गया।
राजे बगीचे को निहार रहे थे। वे स्वयं को रोक नहीं सके। उन्होंने कहा,
‘केशव, बाग को सुंदर सँवारा है !’
‘जी !’
राजे चाफे के पेड़ों को ध्यान से देखते हुए पूछने लगे,
‘चाफे के पेड़ कहाँ से लाए हो ?’
‘कोंकण से लाया हूँ। पंतों ने इन्हें मँगवाया था।’
‘केशव ! जिस पौधों की आवश्यकता हो, उन्हें मँगवाते रहना। मैं कचेरी में कह देता हूँ। तुम रहते कहाँ हो ?’
‘मंदिर के पास ही रहता हूँ, वाड़े के पीछे।’
राजे ने सईबाई की ओर देखते हुए कहा,
‘रानी साहब, बाग तो सचमुच नज़र लग जाए ऐसा सुंदर हो गया है। परंतु…’
‘परंतु क्या ?’
‘आपका फूलों के प्रति प्रेम देखकर मुझे चिंता होती है कि अब मां साहब की पूजा के लिए फूल कैसे बचेंगे !’
रानी सईबाई हँस पड़ीं। राजे ने कहा,
‘चलिए, अब चलते हैं। अभी स्नान भी करना है और कई काम बाकी हैं।’
बाग की खुशी के बाद राजों का महत्वपूर्ण काम
स्नान किया। मां साहब से भेंट की। बाद वे कार्यालय में चले गए। पुरंदर के किलों की प्राचीर से संबंधित विवरण देख रहे थे। काम में काफी समय बीत गया। तभी शामराव नीलकंठ ने आकर सूचना दी,
‘बाजी पासलकर आए हैं।’
‘बाजी ?’
राजे तुरंत खड़े हुए। बाजी इतनी जल्दी क्यों आए हैं, यह बात राजों की समझ में नहीं आ रही थी।
इसी विचार में डूबे राजे बाहर आए। मुख्य कक्ष पर बाजी पासलकर खड़े प्रतीक्षा कर रहे थे।
राजे ने कहा,
‘बाजी, आइए… बैठिए !’
परंतु बाजी बैठे नहीं। उनके चेहरे पर गहरी चिंता दिखाई दे रही थी। राजों को देखकर दिखाई देने वाली प्रसन्नता उनके चेहरे पर नहीं थी। बाजी ने कहा,
‘राजे, मां साहब को हमारे आने की सूचना दीजिए।’
मां साहब की ओर से बुलावा आते ही राजे और बाजी भीतर चले गए।
बाजी पासलकर की चिंता और आने वाले संकट का संकेत
मां साहब ने पूछा,
‘बाजी, इतनी जल्दी संदेश भेजा ?’
‘इस असुविधा के लिए क्षमा चाहता हूँ। बाजी ने कहा, एक अत्यंत आवश्यक बात सामने आ गई है। राजों ने चाकण लिया। शिरवळ के अमीन ने दरबार में शिकायत की है। अब तक शांत बैठा बादशाह भी बेचैन हो उठा है। महाराज साहब भी दक्षिण में हैं। दरबार की इस बदलती हुई नीति पर रोक लगाने वाला कौन है ? आदिलशाही ने हमारा बंदोबस्त करने के लिए फत्तेखान को भेज दिया है। वह विजापुर से निकल चुका है। जैसे ही यह संदेश मिला, मैं बिना देर किए सीधे यहाँ चला आया।
राजों ने गहरी साँस छोड़ी। मुस्कुराते हुए वे बोले,
‘बाजी ! हम तो बहुत घबरा गए थे। सोचा था, न जाने कैसा संदेश लेकर आए हैं ! हमें ऐसी आशंका पहले से ही थी। बल्कि हमारी अपेक्षा से यह सब थोड़ा देर से हुआ है। हम फत्तेखान का सामना करने के लिए तैयार हैं।’
फत्तेखान के विरुद्ध युद्ध की तैयारी
‘राजे, आपके युवा रक्त के लिए ऐसी बातें करना उचित है ; परंतु हमारे बाल सफेद हो चुके हैं। हमें विचार करना चाहिए।’
‘बाजी, हमें भी आपकी चिंता है। मां साहब, आप बस हमें अपना आशीर्वाद दीजिए। हमारे लिए वही पर्याप्त है !’
यह कहते हुए राजे ने आँखों में हल्की शरारत के साथ मां साहब की ओर देखा।
बाजी ने अपनी घनी मूँछों पर हाथ फेरते हुए कहा,
‘राजे ! हमारी कलाई में ताकत बाकी है। पीछे होकर युद्ध देखने की आदत हमें नहीं है !’
फत्तेखान आ चुका था… अब क्या होगा?
सुहानी सुबह अब युद्ध की आहट में बदल चुकी थी।
फत्तेखान विजापुर से निकल चुका था।
राजों की आँखों में भय नहीं, अटूट आत्मविश्वास था।
क्या बाजी की तलवार इस युद्ध का रुख बदल देगी?
इस ऐतिहासिक प्रसंग के प्रमुख पात्र कौन थे?
- छत्रपति शिवाजी महाराज – दूरदर्शी, साहसी और स्वराज्य के लिए समर्पित युवा राजे, जो संकट के सामने भी आत्मविश्वास नहीं खोते।
- रानी सईबाई – राजों के जीवन में स्नेह, अपनापन और भावनात्मक शक्ति का सुंदर आधार बनने वाली रानी सईबाई, जिनके साथ बिताया शांत समय कहानी को भावनात्मक बनाता है।
- बाजी पासलकर – अनुभवी और निडर योद्धा, जिन्होंने संकट की सूचना राजों तक पहुँचाई और युद्ध से पीछे हटने के बजाय उनके साथ खड़े रहने का संकल्प लिया।
- मां साहब – राजों की मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोत, जिनका आशीर्वाद शिवाजी महाराज के लिए सबसे बड़ी शक्ति था।
- फत्तेखान – आदिलशाही की ओर से शिवाजी महाराज का सामना करने के लिए भेजा गया सेनापति, जिसके आगमन से आने वाले संघर्ष की भूमिका तैयार होती है।
फत्तेखान का आगमन: स्वराज्य के इतिहास में क्यों था निर्णायक?
इस प्रसंग में शिवाजी महाराज द्वारा चाकण पर अधिकार करने के बाद आदिलशाही दरबार की चिंता और बढ़ती हुई दिखाई देती है। शिरवळ के अमीन की शिकायत के बाद फत्तेखान को शिवाजी महाराज का सामना करने के लिए भेजा जाता है। यह घटना स्वराज्य के विस्तार और आदिलशाही सत्ता के बीच बढ़ते तनाव को दर्शाती है। बाजी पासलकर जैसे अनुभवी योद्धाओं का साथ शिवाजी महाराज की सैन्य शक्ति और आत्मविश्वास को और मजबूत करता है। यह प्रसंग आने वाले संघर्ष की महत्वपूर्ण भूमिका तैयार करता है।
संकट कितना भी बड़ा हो, साहस उससे बड़ा होना चाहिए
- इस प्रसंग से सीख मिलती है कि कठिन परिस्थितियों में घबराने के बजाय शांत रहकर परिस्थिति को समझना चाहिए।
- शिवाजी महाराज के आत्मविश्वास से पता चलता है कि बड़ी चुनौती सामने होने पर भी लक्ष्य से विचलित नहीं होना चाहिए।
- बाजी पासलकर की निष्ठा यह सिखाती है कि सच्चा साथी केवल सुख में नहीं, संकट की घड़ी में भी साथ खड़ा रहता है।
- वहीं रानी जिजाबाई का आशीर्वाद बताता है कि साहस के साथ सही मार्गदर्शन भी आवश्यक है।
एक शांत सुबह से शुरू हुई युद्ध की आहट
रानी सईबाई के साथ बीती सुहानी सुबह के बाद अचानक फत्तेखान के आगमन की खबर ने वातावरण बदल दिया। राजों ने संकट के सामने डरने के बजाय आत्मविश्वास दिखाया, जबकि बाजी पासलकर ने अपने अनुभव और निष्ठा से साथ देने का संकल्प लिया। अब स्वराज्य के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी थी और आने वाला संघर्ष इतिहास की दिशा बदलने वाला था।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
फत्तेखान को शिवाजी महाराज के विरुद्ध क्यों भेजा गया था?
चाकण पर शिवाजी महाराज के अधिकार और शिरवळ के अमीन की शिकायत के बाद आदिलशाही दरबार चिंतित हो गया था। इसी बढ़ते तनाव के बीच शिवाजी महाराज का सामना करने के लिए फत्तेखान को भेजा गया।
बाजी पासलकर शिवाजी महाराज के पास क्यों आए थे?
बाजी पासलकर फत्तेखान के अभियान की महत्वपूर्ण सूचना लेकर तुरंत राजों के पास पहुँचे थे। उन्होंने संकट की घड़ी में पीछे हटने के बजाय शिवाजी महाराज के साथ युद्ध में खड़े रहने का संकल्प व्यक्त किया।
इस प्रसंग में रानी जिजाबाई की भूमिका क्या थी?
रानी जिजाबाई शिवाजी महाराज के लिए मार्गदर्शक और प्रेरणा का प्रमुख स्रोत थीं। उनका आशीर्वाद राजों के लिए किसी भी युद्ध और संकट का सामना करने की महत्वपूर्ण शक्ति था।