
पुणे पर संकट के बादल मंडरा रहे थे। राजे ने साथियों को तुरंत रवाना किया और पुरंदर को युद्ध के लिए तैयार कर दिया।
उधर खान का सरदार बाळाजी हैबतराव शिरवळ की सुभानमंगल गढ़ी में जा बैठा। अब टकराव तय था।
राजे ने कावजी मल्हार को पहली जिम्मेदारी सौंपी। अमावस्या की घनी रात में वह स्वराज्य की पहली बड़ी मोहीम पर निकल पड़ा।
लेकिन उस अंधेरी रात के बाद क्या होने वाला था? जानिए स्वराज्य की इस पहली निर्णायक मुठभेड़!
पिछले लेख में हमने पढ़ा कि सुबह की शांति में रानी सईबाई के साथ राजों का पल आनंद से भरा था। मोगरे की खुशबू और बाग की सुंदरता ने माहौल को सुखद बना दिया था।
लेकिन कुछ ही देर बाद बाजी पासलकर की गंभीर खबर ने सब बदल दिया। आदिलशाही ने शिवाजी महाराज के विरुद्ध फत्तेखान को भेज दिया था।
राजों ने खतरे को सुनकर घबराने के बजाय मुस्कुराते हुए कहा कि वे फत्तेखान का सामना करने के लिए तैयार हैं। मगर बाजी की चिंता कुछ और संकेत दे रही थी।
अब सामने था एक बड़ा संघर्ष, जहाँ केवल तलवारों की ताकत नहीं, बल्कि साहस और रणनीति की भी परीक्षा होने वाली थी। क्या राजे इस चुनौती को रोक पाएँगे?
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पुणे से पुरंदर की ओर युद्ध की तैयारी
‘तो उठो, बाजी ! सबको इकट्ठा करो। पहला युद्ध पुरंदर पर लड़ा जाएगा। यह जिम्मेदारी तुम्हारी !’
बाजी ने झुककर प्रणाम किया और खड़े हुए; अगले कदम की तैयारी के लिए पुरंधर की ओर चल दिए।
राजाओं के पास अब एक क्षण की भी फुर्सत नहीं थी। तानाजी, फिरंगोजी सभी को तत्काल घुड़सवार रवाना किए गए। पुणे का खजाना तोरणा पर स्थानांतरित कर दिया गया। मां साहब ने कहा,
‘राजे, हम भी पुरंधर आते हैं।’
‘नहीं, मां साहब। फिरंगोजी को आपके साथ छोड़कर जाता हूँ। खान कात्रज पार करके यहाँ तक नहीं आएगा। लेकिन अगर वह आया भी, तो हम आपको तुरंत संदेश पहुँचा देंगे। आप चाकण चली जाइए। हमारी चिंता मत कीजिए। हम सफल होंगे, इसमें कोई संदेह नहीं। बल्कि हम तो यह देखने के लिए अधीर हैं कि यह पहली मुठभेड़ किस प्रकार होती है।’
‘राजे, तुम अवश्य सफल होगे ! लेकिन भीड़ में घुल-मिलकर मत रहना।’
‘हम अपना जीवन यूँ ही संकट में डालने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं। हमारा स्वप्न बहुत बड़ा है और हमें उसकी पूरी समझ है।’
पुरंदर किले पर युद्ध की तैयारी
शुभ दिन देखकर राजे बाजी पासलकर के साथ पुणे से निकल पड़े और पुरंदर पहुँचे। उनके आदेश के अनुसार किले पर सभी उपस्थित थे। गढ़ पर उत्साह का वातावरण था। दारू-गोला पर्याप्त मात्रा में था। महत्वपूर्ण जगहों को पहचानकर तोपों के मोर्चे तैयार किए गए थे। किले की प्राचीरों के पास गोफण से चलाए जाने वाले छोटे पत्थरों से लेकर बड़े-बड़े पत्थरों तक के ढेर लगा दिए गए थे।
सैकड़ों रामोशी किले की प्राचीरों पर लगातार पहरा दे रहे थे। इस पूरी व्यवस्था की जिम्मेदारी कावजी मल्हार ने आगे बढ़कर अपने हाथों में ले ली थी और नेताजी भी पूरी तरह उसका साथ दे रहे थे। गोदाजी जगताप, भिमाजी वाघ, संभाजी काटे, शिवाजी इंगळे, भिकाजी चोर, भैरोजी चोर, पोळ और घाटगे जैसे अनेक वीर पूरे उत्साह के साथ किले की व्यवस्था में जुटे हुए थे।
किले की सुदृढ़ व्यवस्था देखकर राजे संतुष्ट हुए। अगले दो दिनों में ही रामोशियों के माध्यम से खान की गतिविधियों और उसकी सेना से जुड़ी खबरें आने लगीं।
बाळाजी हैबतराव का शिरवळ की ओर बढ़ना
खान ने खळत-बेलसर में अपना डेरा डाल दिया था और अपने एक प्रमुख सरदार, बाळाजी हैबतराव, को सेना देकर आगे भेजा। शिरवळ में आदिलशाही सरकार के अमीन का ठिकाना पहले से ही मौजूद था। बाळाजी हैबतराव अपनी सेना के साथ आगे बढ़ते हुए शिरवळ तक आ पहुँचा। उसने सुभानमंगल की गढ़ी में अपना ठिकाना बना लिया। यह समाचार राजे तक पहुँचा।
गोदाजी जगताप ने कहा, ‘राजे, अब कभी भी बाळाजी हैबतराव को आने दीजिए।’
राजे बोले, ‘नहीं, जगताप ! इस तरह प्रतीक्षा करने से कैसे काम चलेगा? खान का सरदार आगे आया है। हमें भी चार कदम आगे बढ़कर सामना करना चाहिए।’
कावजी मल्हार ने माँगी पहली जिम्मेदारी
कावजी मल्हार आगे आया। ‘राजे, बिल्कुल सही ! शिरवळ का किला मुझे अच्छी तरह मालूम है। मैं जाता हूँ।’
‘शाबाश, कावजी ! तुमने स्वराज्य की पहली जिम्मेदारी माँगी है। इस पर पहला अधिकार तुम्हारा ही है। बाळाजी अभी पूरी तरह जम भी नहीं पाया है, उससे पहले ही उसे जा घेरो। आज ही निकल पड़ो।’
अमावस्या की रात में प्रस्थान का निर्णय
बाजी पासलकर आयु में सबसे बड़े और अनुभवी थे। उन्होंने कहा,
‘राजे, आज अमावस्या है। अगर कल प्रस्थान करें, तो बेहतर रहेगा।’
राजे बोले, ‘आज अमावस्या अवश्य है। लेकिन कल प्रतिपदा है। प्रतिपदा का विजय-प्रतीक बढ़ता है। वही घर लौटने दो। उसे प्राप्त करने के लिए हमें अमावस्या की रात ही प्रस्थान करना होगा।’
प्रस्थान का मुहूर्त निश्चित हो गया। गढ़ पर रात उतर आई। मशालों की टिमटिमाती रोशनी पूरे किले पर दिखाई दे रही थी। घनी अँधेरी रात में आकाश के अनगिनत नक्षत्र चमक रहे थे। उसी समय कावजी मल्हार किले से नीचे उतर पड़ा।
कावजी मल्हार की पहली स्वराज्य मोहीम
विदा करते समय राजे ने उससे कहा,
‘कावजी, यह हमारी पहली मोहीम है। मुझे विजय चाहिए—और उसी विजय का आनंद भी चाहिए। विजयी होकर सकुशल घर लौटना। हम तुम्हारी प्रतीक्षा करेंगे।’
कावजी मल्हार अमावस्या की रात अपने वीरों के साथ सुभानमंगल की ओर बढ़ते हैं।
सामने बाळाजी हैबतराव की सेना है और स्वराज्य की पहली बड़ी परीक्षा शुरू होने वाली है।
क्या कावजी शत्रु को अचानक घेर पाएंगे?
आगे पढ़िए और जानिए इस पहली निर्णायक मोहीम का रोमांचक परिणाम।
इस ऐतिहासिक प्रसंग के प्रमुख पात्र
- छत्रपति शिवाजी महाराज – स्वराज्य के दूरदर्शी नेतृत्वकर्ता, जिन्होंने पहली मोहीम की जिम्मेदारी कावजी मल्हार को सौंपी।
- कावजी मल्हार – शिरवळ की ओर बढ़ने वाली स्वराज्य सेना की जिम्मेदारी संभालने वाले वीर सेनानी।
- बाळाजी हैबतराव – आदिलशाही पक्ष का प्रमुख सरदार, जिसने सुभानमंगल की गढ़ी में अपना ठिकाना बनाया।
- बाजी पासलकर – अनुभवी योद्धा, जिन्होंने युद्ध-प्रस्थान के समय महत्वपूर्ण सलाह दी।
- रानी जिजाबाई – मां साहब, जिन्होंने शिवाजी महाराज को सावधानी और सफलता का आशीर्वाद दिया।
- नेताजी – पुरंदर की सुरक्षा व्यवस्था में कावजी मल्हार का साथ देने वाले प्रमुख सहयोगी।
- गोदाजी जगताप – पुरंदर की युद्ध तैयारी में सक्रिय रूप से योगदान देने वाले वीर।
पुरंदर और स्वराज्य की पहली मोहीम
यह प्रसंग शिवाजी महाराज के शुरुआती स्वराज्य संघर्ष में पुरंदर और शिरवळ क्षेत्र की रणनीतिक भूमिका को सामने लाता है। किले की तैयारी, गुप्त सूचना व्यवस्था और कावजी मल्हार को दी गई जिम्मेदारी उस दौर की सैन्य रणनीति को दर्शाती है।
इस से मिलने वाली प्रमुख सीख
- संकट के समय केवल साहस ही नहीं, बल्कि सही योजना, अनुशासन और समय पर निर्णय भी महत्वपूर्ण होते हैं।
- शिवाजी महाराज का नेतृत्व दिखाता है कि बड़ी चुनौती का सामना तैयारी और जिम्मेदारी बाँटकर किया जा सकता है।
स्वराज्य की पहली परीक्षा
पुरंदर पर तैयारियाँ पूरी थीं और अमावस्या की रात कावजी मल्हार अपनी पहली मोहीम पर निकल चुके थे। अब सामने थी स्वराज्य की पहली निर्णायक परीक्षा—जिसका परिणाम इतिहास बदलने वाला था।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
कावजी मल्हार को कौन-सी जिम्मेदारी दी गई थी?
कावजी मल्हार को शिरवळ जाकर बाळाजी हैबतराव की सेना का सामना करने की जिम्मेदारी दी गई थी।
बाळाजी हैबतराव ने अपना ठिकाना कहाँ बनाया था?
बाळाजी हैबतराव ने अपनी सेना के साथ शिरवळ की सुभानमंगल गढ़ी में अपना ठिकाना बनाया था।
कावजी मल्हार अमावस्या की रात क्यों निकले?
शिवाजी महाराज ने अगले दिन की प्रतिपदा को विजय के प्रतीक के रूप में देखते हुए अमावस्या की रात ही प्रस्थान का निर्णय लिया था।