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आदिलशाही कूटनीति, शहाजी राजे कैद, शिवाजी राजे संकट में!

पुरंदर की विजय से मावल में उत्सव का माहौल था, तभी बेंगलुरु से आया एक खलीता राजे के हाथों में पहुँचा और पलभर में सारी खुशी चिंता में बदल गई।

शहाजी राजे को विश्वासघात से बंदी बना लिया गया था। आदिलशाही की इस चाल ने शिवाजी महाराज के सामने नया संकट खड़ा कर दिया।

पिता की बेड़ियाँ देखकर राजे का क्रोध भड़क उठा, लेकिन जल्दबाजी का हर कदम पूरे भोसले घराने को खतरे में डाल सकता था।

अब सवाल था—शहाजी राजे की मुक्ति कैसे होगी? पूरी कहानी आगे पढ़ें और जानिए इस संकट के पीछे छिपी अगली चाल।


पिछले लेख में हमने पढ़ा कि पुरंदर की विजय के बाद पूरा वाड़ा आनंद और उत्साह से भर गया था। आधी रात को राजे और रानी सईबाई को कुछ पल साथ बिताने का अवसर मिला, लेकिन उस रात एक खास राज़ खुलने वाला था।

आभूषणों की बात छिड़ी तो राजे ने अचानक रानी सईबाई के लिए सोने का कमरपट्टा और चाँदी की सुंदर पैंजनियाँ सामने रख दीं।

पैंजनियाँ सुभानमंगल के खजाने से मिली थीं। उन्हें देखते ही राजे को रानी सईबाई की याद आई थी। मगर उनकी मधुर झंकार सुनते ही रानी सईबाई के मन में एक डर जाग उठा।

आखिर राजे ने सबकी नजर बचाकर पैंजनियाँ क्यों रखवाई थीं? रानी सईबाई ने उन्हें पहनने से अचानक क्यों मना कर दिया? इस भावुक राज़ को जानने के लिए पूरी कहानी पढ़ें…


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पुरंदर की विजय के बाद वीरों का सम्मान

पुरंदर की लड़ाई में जिन वीरों ने अदम्य शौर्य का प्रदर्शन किया था, राजे ने उनका यथोचित सत्कार किया। युद्ध में जो वीर काम आए थे, उनके वारिसों को आर्थिक सहायता प्रदान की गई। खलद-बेलसर के पराक्रम से पूरा मावल आनंद से भर उठा था।

बेंगलुरु से आया रहस्यमय खलीता

लेकिन यह आनंद टिकने वाला नहीं था। बेंगलुरु से एक अत्यंत महत्वपूर्ण खलीता आया। खलीता पढ़कर राजे क्रोध से तमतमा उठे। कुछ क्षणों के लिए उन्हें ऐसा लगा, मानो उनके पैरों तले की जमीन ही खिसक रही हो।

राजे मां साहब को बोले,

‘मां साहब, बेंगलुरु से दादामहाराज का खलीता आया है।’

‘क्या कहते हैं, संभाजी ?’

‘आदिलशाही दरबार में भोसले घराने के विरुद्ध जैसे पूरा षड्यंत्र ही रचा जा रहा है।’

बेंगलुरु पर आदिलशाही की चाल

‘हमारे विरुद्ध जिस तरह फत्तेखान और बालाजी हैबतराव को भेजा गया था, उसी तरह आदिलशाही ने बेंगलुरु पर अधिकार करने के लिए फरहादखान और तानाजी डुरे को भी भेजा था। लेकिन दादामहाराज ने उनका भी हमारे समान ही पूरी तरह पराभव कर दिया। फरहादखान को असफल होकर लौटना पड़ा।’

‘ईश्वर की कृपा है ! तुम दोनों इस संकट से सुरक्षित निकल आए।’

शहाजी राजे पर मंडराया संकट

राजे ने गहरी साँस लेते हुए कहा,

‘नहीं, मां साहब ! आदिलशाही के साथ हुई यह मुठभेड़ बहुत भारी पड़ने वाली है। जब हम यहाँ विजय प्राप्त कर रहे थे, उसी समय दक्षिण में जंजी के निकट महाराज साहब आदिलशाही के बिछाए हुए जाल में फँस गए। मुस्तफाखान ने विश्वासघात करके उन्हें बंदी बना लिया।’

‘शिवबा… क्या कह रहे हो ?’ मां साहब ने कहा।

विश्वासघात से शहाजी राजे गिरफ्तार

‘सुनिए, मां साहब, दुर्भाग्य की कहानी सुनिए ! आबा साहब छावनी में विश्राम कर रहे थे। वे निश्चिंत थे। तभी मुधोल के बाजी घोरपड़े ने छावनी में प्रवेश किया। घोरपड़ों और महाराज साहब के बीच मुठभेड़ हुई। फर्जंद शहाजी राजे को गिरफ्तार कर लिया गया। जिन शहाजी राजे का दरबार में प्रवेश हाथी पर सवार होकर होता था। जिनका वैभव आदिलशाही के वैभव को भी मात देता था। वही फर्जंद शहाजी राजे आज पैरों में बेड़ियाँ डाले विजापुर लाए गए। अफजल खान ने नौरोज के त्योहार के दिन महाराज साहब को उसी अवस्था में दरबार में उपस्थित किया।’

मां साहब की आँखों में आँसू छलक आए। उन्होंने कंपित स्वर में पूछा,

‘औरऽऽ…?’

आदिलशाही की कैद में शहाजी राजे

‘और क्या ? इस समय महाराज साहब आदिलशाही की कैद में हैं। मां साहब, एक न एक दिन उस अफजलखान और बाजी घोरपड़े को अपने किए पर पश्चात्ताप अवश्य होगा। शिवाजी के पिता के हाथ-पाँव में बेड़ियाँ डालना इतना आसान नहीं है—यह बात उन्हें जल्द ही समझ में आ जाएगी।’

‘वह जब होगा, तब होगा। लेकिन अभी क्या करना है ?’

शहाजी राजे की मुक्ति का रास्ता?

‘यही सोच रहा हूँ। लेकिन कोई उपाय सूझ नहीं रहा। आदिलशाही के विरुद्ध हमने कदम उठाया है। फत्तेखान और बंगळूर से भेजा गया पराजित फरहादखान—दोनों ही शाही तख्त के सामने हमारे नाम की शिकायतें लेकर अपना दुखड़ा रो रहे होंगे।’

‘महाराज साहब की मुक्ति होगी, ऐसा लगता नहीं।’

शिवाजी महाराज का क्रोध और अगला कदम

राजे ने क्रोध से अपनी मुट्ठियाँ भींचकर कहा,

‘आदिलशाही ने बहुत घातक चाल चली है। लगता है, दादामहाराज को संदेश भेजकर सीधे विजापुर पर चढ़ाई कर देनी चाहिए।’

अमात्य ने कहा, ‘राजे, ऐसा करना तो जानबूझकर मृत्यु को गले लगाने जैसा होगा।’

‘क्या किया जाए। कुछ समझ में नहीं आ रहा।’

धैर्य रखने की सलाह

पेशवे ने कहा, ‘राजे, जब तक विजापुर की ओर से कुछ नहीं आता, तब तक हम आगे कैसे बढ़ेंगे ? थोड़ा समय बीतने दीजिए। अपने आप मार्ग निकल आएगा।’

‘तब तक आदिलशाही चैन से बैठी रहेगी ?’ मां साहब ने पूछा।

‘आदिलशाही इतनी जल्दबाजी में कोई निर्णय नहीं ले सकती। शहाजी राजे के बाल को भी यदि नुकसान पहुँचाया गया, तो हम सहित सभी हिंदू सरदार इसे सहन नहीं करेंगे, इस बात का भान आदिलशाही को भली-भाँति है।’ राजे ने कहा।

शिवाजी महाराज की बढ़ती चिंता

राजे ने मां साहब को धीरज तो बँधाया, लेकिन अपने मन को वे स्वयं समझा नहीं सके। बीतने वाला हर दिन उनके लिए चिंता में गुजरने लगा। मां साहब के चेहरे पर छाई चिंता और भय को देखने का साहस तक राजे नहीं जुटा पाते थे।


शहाजी राजे की मुक्ति का रहस्य

शहाजी राजे आदिलशाही की कैद में थे और शिवाजी महाराज गहरी चिंता में डूब गए थे।

पिता की मुक्ति के लिए क्या राजे विजापुर पर चढ़ाई करने का साहसिक निर्णय लेंगे?

या फिर कूटनीति से आदिलशाही को मात देने का कोई रास्ता खोजेंगे?

अब हर कदम शहाजी राजे के जीवन और भोसले घराने के भविष्य को तय करने वाला था। पूरी कहानी आगे पढ़ें।


इस संकट के केंद्र में कौन-कौन था?

  • शिवाजी महाराज – शहाजी राजे की कैद के बाद संकट से निकलने का मार्ग खोजने वाले दूरदर्शी राजे।
  • मां साहब – कठिन समय में शिवाजी महाराज को धैर्य और साहस देने वाली मां साहब।
  • शहाजी राजे – आदिलशाही की चाल के कारण बंदी बनाए गए भोसले घराने के प्रमुख।
  • मुस्तफाखान – शहाजी राजे को बंदी बनाने की कार्रवाई से जुड़ा आदिलशाही सेनापति।
  • बाजी घोरपड़े – छावनी में हुए संघर्ष के दौरान शहाजी राजे की गिरफ्तारी से जुड़े योद्धा।

शहाजी राजे की गिरफ्तारी ने बदला घटनाक्रम

शहाजी राजे की गिरफ्तारी ने शिवाजी महाराज के सामने एक गंभीर राजनीतिक और पारिवारिक संकट खड़ा किया। एक ओर स्वराज्य विस्तार की चुनौती थी, तो दूसरी ओर पिता की सुरक्षित मुक्ति आवश्यक थी। इस परिस्थिति ने सैन्य शक्ति के साथ कूटनीति और धैर्य के महत्व को भी सामने रखा।


संकट में धैर्य ही शक्ति है

  • बड़े संकट में केवल क्रोध के आधार पर निर्णय लेना उचित नहीं होता।
  • शिवाजी महाराज के सामने पिता की कैद का दुःख था, फिर भी परिस्थिति को समझकर सही समय और सही रणनीति की तलाश आवश्यक थी।
  • यह प्रसंग धैर्य, दूरदर्शिता और कूटनीति का महत्व बताता है।

एक कैद, जिसने नई चुनौती खड़ी कर दी

शहाजी राजे की गिरफ्तारी ने शिवाजी महाराज के जीवन में एक कठिन मोड़ ला दिया। पिता की चिंता और स्वराज्य की जिम्मेदारी के बीच अब उन्हें ऐसा रास्ता खोजना था, जो दोनों को सुरक्षित रख सके।


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शहाजी राजे की गिरफ्तारी (FAQs)

शहाजी राजे को किसने बंदी बनाया?

इस प्रसंग के अनुसार शहाजी राजे को आदिलशाही की कार्रवाई के दौरान बंदी बनाया गया और बाद में उन्हें विजापुर ले जाया गया।

शहाजी राजे की गिरफ्तारी की खबर से शिवाजी महाराज पर क्या प्रभाव पड़ा?

शिवाजी महाराज अत्यंत चिंतित और क्रोधित हुए, लेकिन उन्होंने परिस्थिति को समझकर आगे की रणनीति पर विचार करना शुरू किया।

इस संकट में शिवाजी महाराज के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या थी?

सबसे बड़ी चुनौती शहाजी राजे की सुरक्षित मुक्ति और स्वराज्य के अभियान को जारी रखने के बीच संतुलन बनाए रखना था।