
पिता की कैद ने शिवाजी महाराज का मन बेचैन कर दिया था। विजापुर पर हमला करें या संधि—हर रास्ता संकट से भरा था।
तभी रानी सईबाई ने शतरंज की एक साधारण-सी चाल का उदाहरण दिया। लेकिन उनकी वही बात महाराज के मन में एक अद्भुत विचार जगा गई।
एक पल में निराशा आशा में बदल गई। महाराज ने ऐसा रास्ता खोज निकाला, जिसकी कल्पना शायद आदिलशाही ने भी नहीं की थी।
आखिर रानी सईबाई की वह कौन-सी बात थी, जिसने शिवाजी महाराज की पूरी रणनीति बदल दी? पूरी कहानी आगे पढ़ें…
पिछले लेख में हमने पढ़ा कि पुरंदर की विजय से मावल में उत्सव का माहौल था, तभी बेंगलुरु से आया एक खलीता राजे के हाथों में पहुँचा और पलभर में सारी खुशी चिंता में बदल गई।
शहाजी राजे को आदिलशाही की चाल के तहत बंदी बना लिया गया था। पैरों में बेड़ियाँ डालकर उन्हें विजापुर ले जाया गया—यह समाचार सुनकर मां साहब की आँखों में आँसू छलक उठे।
शिवाजी महाराज क्रोध से भर उठे, लेकिन पिता की मुक्ति के लिए उठाया गया गलत कदम पूरे भोसले घराने को संकट में डाल सकता था। अब हर निर्णय बेहद महत्वपूर्ण था।
क्या शहाजी राजे आदिलशाही की कैद से मुक्त हो पाएँगे? शिवाजी महाराज इस घातक संकट से कैसे निकलेंगे? पूरी कहानी पढ़ें और जानिए निर्णायक मोड़।
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शिवाजी महाराज को मुरार जगदेव की याद
राजाओं को मुरार जगदेव की याद आ रही थी। मुरार जगदेव भी एक ‘महाराज’ ही थे। ऐश्वर्य-संपन्न और पराक्रमी। लेकिन आदिलशाही में उनका विनाश होते देर नहीं लगी। पुरंदर पर अधिकार करके तो सीधे आदिलशाही को ही चुनौती दे दी थी।
शाहाजी महाराज की कैद और शिवाजी महाराज की बेचैनी
इन्हीं बेचैनी के बीच राजे अपने शय्या पर लेटे थे। आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं था। रानी सईबाई धीमे कदमों से महल में आईं। राजाओं ने उन्हे पुकारा,
‘सई !’
‘आप सोए नहीं ?’ रानी सईबाईं ने आश्चर्य से पूछा।
राजे शय्या पर उठकर बैठ गए और बोले,
‘नींद ही नहीं आ रही। आँखों के सामने बार-बार महाराज साहब का चेहरा उभर आता है। मां साहब के मन पर क्या बीत रही होगी, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। बाल बनाते समय प्रतिदिन उनका हाथ सिंदूर की डिबिया पर ठिठक जाता होगा। कितनी अशुभ कल्पनाओं ने उनके मन को घेर रखा होगा।’
‘मां साहब ने अनुष्ठान के लिए ब्राह्मणों को बैठाया है। गणपती पर अभिषेक चल रहा है। मैंने भी नवस बोला है।’
कर्म और ईश्वर की कृपा
‘प्रयत्न करने पर ही ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है, सई ! केवल अनुष्ठान करने से वह प्रसन्न नहीं होता। उसके साथ कर्म का जुड़ना भी आवश्यक है।’
‘क्या करने का विचार है ?’
‘यहाँ चुपचाप बैठे रहकर क्या किया जा सकता है ? शरणागति स्वीकार करने के बजाय मन में आता है कि विजापुर पर ही चढ़ाई कर दी जाए।’
‘उसमें सफलता मिलेगी ?’
‘संभावना बहुत कम है। लेकिन अपमानित होकर जीवन तो नहीं जीना पड़ेगा। तुम्हें क्या लगता है ?’
सईबाई की शतरंज वाली सलाह
रानी सईबाई कुछ क्षण विचारमग्न रहीं। फिर धीरे से बोलीं,
‘राजनीति के बारे में स्त्रियों को कितना समझ आता है ? लेकिन लगता है…’
‘क्या ? कहो ना !’
‘नहीं, आप हँसेंगे।’
‘नहीं हँसूँगा। कहो।’
‘राजनीति के दाँव-पेंच हमें न तो आते हैं, न ही उनकी समझ है। हाँ, आपकी संगति में सीखा हुआ शतरंज समझती हूँ। जिस चाल में जीत की कोई निश्चितता न हो, वह चाल नहीं चलनी चाहिए। हाथी को हराने के लिए वज़ीर को ही आगे करना आवश्यक है, ऐसा थोड़े ही है ? अवसर मिले, तो यह काम ऊँट या घोड़ा भी कर सकता है।’
एक साधारण बात से मिला असाधारण विचार
राजे रानी सईबाई की ओर विस्मय से देखते रहे। वे उठकर खड़े हो गए। मानो स्वयं से ही बात कर रहे हों, वे धीरे से बोले,
‘हाथी को हराने के लिए… ऊँट… घोड़ा भी चल सकता है…’
‘क्या कहा आपने ?’
‘ठहरो ! कुछ मत बोलो !’
राजे कुछ क्षण बिना हिले-डुले खड़े रहे। अचानक वे ज़ोर से हँस पड़े। फिर मुड़े तो उनका चेहरा प्रसन्नता से खिल उठा था। राजे बोले,
‘सई, कभी-कभी बड़े-बड़े संकट भी कितनी आसानी से हल हो जाते हैं! रानी साहब, हम आपसे बहुत प्रसन्न हैं।’
‘मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।’
‘तुम इतनी भोली हो कि स्वयं परमेश्वर ने तुम्हारे मुख से यह बात कहलवा दी।’
शुभ समय में नई रणनीति का निर्णय
राजे ने मोजड़ी पहन ली। फिर रानी सईबाई से बोले,
‘सई, मां साहब को जगा दो। हम सभी को बुलाते हैं। शुभ समय में जो बात सूझी है, उसे उसी समय करके निश्चिंत हो जाना चाहिए।’
महल में दीप प्रज्वलित कर दिए गए। दबीर, अमात्य और पेशवा भी आ पहुँचे। इतनी तात्कालिकता से बुलाए जाने के कारण सभी असमंजस में थे।
विजापुर पर चढ़ाई या संधि?
मां साहब ने पूछा,
‘राजे ! आपने इतनी जल्दी सबको क्यों बुला लिया ?’
राजे ने सभी लोगों पर एक नजर डाली और पूछा,
‘यदि हम विजापुर पर चढ़ाई करने का निश्चय करें, तो ?’
‘वह तो आत्मघात सिद्ध होगा !’
‘यदि हम संधि स्वीकार कर लें, तो ?’ राजे ने पूछा।
‘अब तक किए गए सारे प्रयास व्यर्थ हो जाएँगे। फिर ऐसा अवसर दोबारा नहीं मिलेगा।’ अमात्य ने कहा।
शहजादे मुराद को संदेश भेजने की योजना
राजे ने निळोजीपंत की ओर देखते हुए पूछा,
‘शहजादे मुराद इस समय कहाँ हैं ?’
निळोजीपंत ने कहा, ‘शहजादे अहमदाबाद में हैं।’
‘निळोजीपंत, शहजादे को एक खत भेजिए। उन्हें सूचित कीजिए कि उनकी सेवा में रहना हम अपने लिए सौभाग्य समझेंगे। यह भी लिखिए कि आदिलशाह ने बिना किसी कारण हमारे पिता को बंदी बना लिया है, जिसके कारण हम संकट में पड़ गए हैं। अन्यथा हम स्वयं शहजादे के दर्शन के लिए उपस्थित होते। यह भी लिखिए कि जैसे ही उनकी ओर से आश्वासन का खत प्राप्त होगा, हम उनके दर्शन के लिए स्वयं उपस्थित हो जाएँगे।’
‘वाह, राजे ! यह तो कूटनीति की पराकाष्ठा है !’
अहमदाबाद के लिए रवाना हुआ गुप्त संदेश
उसी रात खलीता तैयार किया गया और बिना विलंब किए उसे अहमदाबाद भेज दिया गया।
शाहाजी महाराज की कैद छुड़ाने के लिए शिवाजी महाराज ने एक अप्रत्याशित कूटनीतिक चाल चली।
रानी सईबाई की बात से मिली प्रेरणा अब एक बड़े राजनीतिक कदम में बदल चुकी थी।
अहमदाबाद भेजा गया संदेश शहजादे मुराद तक पहुँचेगा तो क्या जवाब मिलेगा?
क्या यह संदेश शाहाजी महाराज की मुक्ति का रास्ता खोल पाएगा? पूरी कहानी आगे पढ़ें।
प्रमुख पात्र और उनका परिचय
- छत्रपति शिवाजी महाराज – पिता शाहाजी महाराज की मुक्ति के लिए संघर्ष करते हुए नई कूटनीतिक रणनीति बनाते हैं।
- रानी सईबाई – शतरंज की सरल मिसाल देकर शिवाजी महाराज को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक विचार देती हैं।
- राजमाता जिजाबाई – शाहाजी महाराज की कैद के कारण चिंतित हैं और उनकी सुरक्षा के लिए अनुष्ठान कराती हैं।
- शाहाजी महाराज – आदिलशाही द्वारा बंदी बनाए गए शिवाजी महाराज के पिता, जिनकी मुक्ति पूरे प्रसंग का केंद्र है।
- शहजादे मुराद – अहमदाबाद में मौजूद मुगल शहजादे, जिन्हें शिवाजी महाराज संदेश भेजने का निर्णय लेते हैं।
- अमात्य – संकट के समय शिवाजी महाराज की रणनीति पर विचार रखने वाले प्रमुख सहयोगी।
- निळोजीपंत – शहजादे मुराद तक शिवाजी महाराज का संदेश पहुँचाने की जिम्मेदारी संभालते हैं।
लेख का ऐतिहासिक महत्व
यह प्रसंग शिवाजी महाराज की राजनीतिक सूझबूझ और परिस्थिति के अनुसार रणनीति बदलने की क्षमता को दर्शाता है। सीधे विजापुर से टकराने के बजाय उन्होंने शहजादे मुराद से संपर्क साधने का रास्ता चुना, जिससे शाहाजी महाराज की कैद के संकट से निपटने का नया विकल्प सामने आया।
इस लेख से मिलने वाली प्रमुख सीख
- बड़े संकट में जल्दबाजी से लिया गया निर्णय हमेशा समाधान नहीं देता।
- शिवाजी महाराज और सईबाई के संवाद से समझ आता है कि कठिन परिस्थिति में शांत रहकर अलग-अलग विकल्पों पर विचार करना और सही समय पर सही रणनीति अपनाना महत्वपूर्ण होता है।
एक विचार जिसने बदल दी रणनीति
शाहाजी महाराज की कैद ने शिवाजी महाराज को गहरे संकट में डाल दिया था, लेकिन सईबाई की एक सरल बात ने उन्हें नई कूटनीतिक दिशा दिखाई। अहमदाबाद भेजा गया संदेश अब आगे क्या परिणाम लाएगा?
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
शिवाजी महाराज विजापुर पर हमला क्यों नहीं करना चाहते थे?
विजापुर पर सीधा हमला करना अत्यंत जोखिमपूर्ण था। इसलिए उन्होंने संघर्ष के साथ-साथ कूटनीतिक विकल्प पर भी विचार किया।
रानी सईबाई की बात से शिवाजी महाराज को क्या विचार मिला?
रानी सईबाई ने शतरंज की चाल का उदाहरण देते हुए बताया कि किसी बड़े लक्ष्य के लिए हमेशा सबसे शक्तिशाली मोहरे को ही आगे करना जरूरी नहीं होता।
शिवाजी महाराज ने शहजादे मुराद को संदेश क्यों भेजा?
शाहाजी महाराज की कैद के संकट में शिवाजी महाराज ने शहजादे मुराद से संपर्क कर एक वैकल्पिक राजनीतिक रास्ता तलाशने का निर्णय लिया।