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आलंदी में शिवाजी महाराज और संत तुकाराम महाराज की भेंट!

शहाजी राजे की चिंता ने शिवाजी महाराज की रातों की नींद छीन ली थी। अहमदाबाद से उत्तर न आने के कारण मन बेचैन था और संकट गहराता जा रहा था।

माँ साहब की आँखों में भी चिंता और आँसू थे। इसी बीच शिवाजी महाराज के मन में अचानक आलंदी जाकर ज्ञानेश्वर महाराज के दर्शन करने की तीव्र इच्छा जागी।

इंद्रायणी पार कर राजे आलंदी पहुँचे और मंदिर में मस्तक झुकाया। तभी उन्हें पता चला—संत तुकाराम महाराज स्वयं वहाँ आ रहे हैं!

क्या यह केवल संयोग था, या आने वाला था कोई ऐसा संदेश जो शहाजी राजे के भाग्य की दिशा बदल देगा? पूरी कहानी आगे पढ़ें और जानिए उस भेंट में क्या हुआ।


पिछले लेख में हमने पढ़ा कि शाहाजी महाराज की कैद ने शिवाजी महाराज को भीतर तक बेचैन कर दिया था। सामने दो ही रास्ते थे—विजापुर पर चढ़ाई या अपमानजनक संधि!

तभी रानी सईबाई ने शतरंज की एक साधारण-सी चाल का उदाहरण दिया। लेकिन उनकी बात सुनते ही महाराज के मन में जैसे बिजली कौंध गई।

एक क्षण पहले जो संकट असंभव लग रहा था, उसका रास्ता अचानक दिखाई देने लगा। महाराज ने ऐसी कूटनीतिक चाल सोच ली, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी।

आखिर सईबाई की वह कौन-सी बात थी? महाराज ने अहमदाबाद के शहजादे मुराद को ही क्यों संदेश भेजा? पूरी कहानी पढ़ें…


५-१

महल में सुबह-सुबह पहुँचे शिवाजी महाराज

राजे को भली-भाँति सवेरे महल में आया हुआ देखकर माँ साहब को आश्चर्य हुआ।

‘राजे ! आज इतनी सुबह आ गए ? इतनी जल्दी स्नान और पूजा भी संपन्न कर ली ?’

‘जी !’

‘नींद नहीं आई ?’

‘माँ साहब ! हम पूरी रात बेचैन रहे। भोर के समय न जाने कैसा स्वप्न आया कि अचानक हमारी आँख खुल गई।’

‘चिंता से बड़ा मनुष्य का कोई शत्रु नहीं होता, देखो।’ माँ साहब ने गहरी साँस छोड़ते हुए कहा।

शहाजी राजे की चिंता ने बढ़ाई बेचैनी

राजे अपनी चिंता छिपा नहीं सके।

‘माँ साहब ! अहमदाबाद को संदेश भेजे हुए कई दिन बीत गए हैं, लेकिन अभी तक कोई उत्तर नहीं आया। हर दिन चिंता में बीत रहा है। विजापुर की चिंता सताती है। वह अफजल और बाजी घोरपड़े कौन-सी चाल चलेंगे, इसका कोई भरोसा नहीं है।’

राजे की बातें सुनकर माँ साहब की चिंता और बढ़ गई। उनकी आँखों में आँसू भर आए।

‘शिवबा ! क्या कोई दूसरा उपाय नहीं है ?’

राजे तुरंत बोले,

‘माँ साहब ! आप चिंता मत कीजिए। महाराज साहब के बाल तक को कोई छू नहीं सकेगा। हमें पूरा विश्वास है। हमने जो चाल चली है, वह सफल हुए बिना नहीं रहेगी। महाराज साहब सम्मानपूर्वक मुक्त होकर लौटेंगे।’

माँ साहब की चिंता और प्रार्थना

‘तुम्हारे मुँह में शक्कर गिरे ! क्या बताऊँ ? शिवबा, कोई घुड़सवार आया है, इतना सुनते ही कलेजा काँप उठता है। कोई ज़रा-सी ऊँची आवाज़ में पुकार दे, तो भी शरीर काँपने लगता है। जब से समाचार मिला है, तभी से देवताओं का अभिषेक चल रहा है। कितने ही मन्नतें मान चुकी हूँ। न जाने कब उन्हें हम पर दया आएगी !’

‘यही बात हमारे मन में भी आई है।’

‘क्या ?’

‘आज भोर से ही मन में आ रहा है कि आलंदी जाऊँ और भगवान के दर्शन करूँ। सुबह जब आँख खुली, वह आलंदी की ही स्मृति से !’

‘अवश्य जाओ ! संकट के समय वही सहारा है !’

माँ साहब की अनुमति से राजाओं का आलंदी जाने का निश्चय पक्का हो गया।

आलंदी के लिए रवाना हुआ शिवाजी महाराज का दल

राजाओं की अश्व टुकड़ी तैयार हो गई। येसाजी, तानाजी और नेताजी जैसे साथियों के साथ राजे आलंदी के लिए रवाना हुए।

गर्मियों की वह सुबह बेहद सुहावनी थी। छोटी-बड़ी पहाड़ियों को पार करते हुए राजाओं का दल तेज़ गति से बढ़ रहा था। राजे इंद्रायणी के पास पहुँचे, तब सूर्य काफी ऊपर चढ़ चुका था। गर्मी के दिनों के कारण इंद्रायणी का जलस्तर काफी कम हो गया था और नदी के अधिकांश पत्थर साफ दिखाई दे रहे थे।

इंद्रायणी पार कर आलंदी पहुँचे राजे

ज्ञानेश्वर महाराज के मंदिर के शिखर के दर्शन होते ही राजे ने हाथ जोड़ लिए। नदी पार करके वे गाँव में प्रवेश कर गए। टापों की आवाज़ से भयभीत हुए नागरिक, राजाओं को देखते ही प्रसन्न होकर आगे आने लगे और आदरपूर्वक अभिवादन करने लगे।

मंदिर के सामने राजे घोड़े से उतरे। मंदिर के बाहर राजाओं की अश्वदल की लगभग सौ से सवा सौ घोड़ियाँ खड़ी थीं। राजे अपने चुनिंदा साथियों के साथ मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ने लगे।

ज्ञानेश्वर महाराज के मंदिर में शिवाजी महाराज

महाद्वार की देहरी को स्पर्श करके राजे भीतर के चौक में पहुँचे। वह चौक चारों ओर से विशाल और खुले बरामदों से सजा हुआ था। दाहिनी ओर पीपल का चबूतरा खड़ा था और सामने ज्ञानदेव महाराज का मंदिर था।

राजे ने मंदिर में प्रवेश किया। पुजारी ने थाली में रखी माला आगे बढ़ाई, जिसे राजे ने ज्ञानदेव महाराज को अर्पित किया। अत्यंत विनम्र भाव से राजे ने देवता के सामने अपना मस्तक झुका दिया।

राजे संतोषपूर्वक बोले, ‘जब भी हमारा मन बेचैन होता है, हम यहाँ चले आते हैं। यहाँ आते ही मन को शांति मिलती है। सारी बेचैनी दूर हो जाती है। हमें यह स्थान बहुत प्रिय है।’

मंदिर में अचानक पहुँचा रहस्यमयी समाचार

इतने में पुजारी थाली लेकर आए। राजे ने उसमें मोहरों की थैली खाली कर दी। देवदर्शन करने के बाद राजे वापस लौटने के लिए मुड़े। तभी उनकी नज़र महाद्वार से भीतर आते लोगों के एक बड़े समूह पर पड़ी। उसी भीड़ में से येसाजी तेजी से उनकी ओर बढ़ता हुआ दिखाई दिया। येसाजी राजाओं के पास पहुँचा, अभिवादन किया और बोला,

‘तुकाराम महाराज आ रहे हैं।’

‘आज सचमुच हमारा भाग्य जाग उठा !’ राजे ने कहा और गर्भगृह के सामने से एक ओर हट गए।

आलंदी में गूँजा ‘जय जय राम कृष्ण हरी’

एक तरफ खड़े होकर राजे बड़ी उत्सुकता में देखने लगे। तभी टाल-मृदंग की संगत के साथ भजन की ध्वनि उनके कानों पर पड़ी—

‘जय जय राम कृष्ण हरीऽऽ… जय जयऽऽ…’


शिवाजी महाराज की बेचैनी के बीच संत तुकाराम महाराज का आलंदी पहुँचना क्या संकेत देता है?

क्या इस भेंट से शहाजी राजे की मुक्ति का कोई मार्ग खुलेगा?

तुकाराम महाराज के आगमन के पीछे कौन-सा संदेश छिपा है?

पूरी कहानी पढ़िए और जानिए आगे क्या हुआ।


प्रमुख पात्र और उनका परिचय

  • छत्रपति शिवाजी महाराज – शहाजी राजे की चिंता के बीच समाधान और आध्यात्मिक सहारे की तलाश में आलंदी पहुँचते हैं।
  • माँ साहब – संकट की घड़ी में शिवाजी महाराज को भावनात्मक संबल और आशीर्वाद देती हैं।
  • शहाजी राजे – संकट में घिरे शिवाजी महाराज के पिता, जिनकी मुक्ति इस प्रसंग की प्रमुख चिंता है।
  • संत तुकाराम महाराज – जिनके अचानक आलंदी आगमन से कहानी में एक नया रहस्य और आध्यात्मिक मोड़ आता है।
  • येसाजी – शिवाजी महाराज को तुकाराम महाराज के आगमन की महत्वपूर्ण सूचना देते हैं।
  • तानाजी और नेताजी – शिवाजी महाराज के साथ आलंदी की यात्रा में शामिल विश्वसनीय साथी।

यह प्रसंग शिवाजी महाराज के जीवन में आध्यात्मिक विश्वास, पारिवारिक चिंता और राजनीतिक संकट के संगम को दर्शाता है। आलंदी, संत ज्ञानेश्वर महाराज की परंपरा और संत तुकाराम महाराज का संदर्भ उस समय के महाराष्ट्र के धार्मिक-सांस्कृतिक वातावरण की झलक देता है।


इस लेख से मिलने वाली प्रमुख सीख

  • संकट कितना भी बड़ा क्यों न हो, धैर्य, विश्वास और सही निर्णय की आवश्यकता बनी रहती है।
  • शिवाजी महाराज की बेचैनी के बीच भी उनका आत्मविश्वास और समाधान खोजने का प्रयास हमें कठिन परिस्थितियों में संयम बनाए रखने की प्रेरणा देता है।

शहाजी राजे की चिंता से व्याकुल शिवाजी महाराज आलंदी पहुँचे, लेकिन वहाँ संत तुकाराम महाराज का अचानक आगमन कहानी को एक रहस्यमयी मोड़ दे देता है। आगे क्या हुआ, यही इस प्रसंग का सबसे बड़ा आकर्षण है।


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पाठकों के प्रश्न (FAQs)

शिवाजी महाराज आलंदी क्यों गए थे?

शिवाजी महाराज शहाजी राजे के संकट को लेकर चिंतित थे और मन की शांति के लिए आलंदी में ज्ञानेश्वर महाराज के दर्शन करने गए थे।

आलंदी में शिवाजी महाराज को कौन-सी महत्वपूर्ण खबर मिली?

येसाजी ने शिवाजी महाराज को बताया कि संत तुकाराम महाराज वहाँ आ रहे हैं, जिससे प्रसंग में एक नया रहस्य पैदा हो गया।

इस कहानी में शहाजी राजे की चिंता क्यों थी?

शहाजी राजे संकट में थे और अहमदाबाद भेजे गए संदेश का उत्तर कई दिनों से नहीं आया था, इसलिए शिवाजी महाराज और माँ साहब चिंतित थे।