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खळत-बेलसर की लड़ाई में बाजी पासलकर का बलिदान!

फत्तेखान की सेना टूट चुकी थी, लेकिन युद्ध अभी खत्म नहीं हुआ था।

बाजी पासलकर ने विजय के बीच फिर रणभूमि में उतरकर इतिहास बदल दिया।

घायल बाजी ने शिवाजी राजे से कहा—‘राजे, हमारी विजय हुई !’

लेकिन उनकी आखिरी मुस्कान के पीछे छिपी कुर्बानी क्या थी? पूरी कहानी आगे पढ़ें…


पिछले लेख में हमने पढ़ा कि सुभानमंगल की गढ़ी के नीचे कावजी मल्हार की सेना जमा हुई। सुबह होते ही मराठा वीरों ने किले पर ऐसा धावा बोला कि शत्रु सेना में भय फैल गया।

तीरों, पत्थरों और अंगारों की बारिश के बीच प्राचीर टूटने लगी। तभी कावजी की नजर बाळाजी हैबतराव पर पड़ी… और युद्ध का रुख बदल गया।

किला जीतकर प्राचीर पर भगवा लहराया, लेकिन असली तूफान अभी बाकी था। सुभानमंगल की हार की खबर सुनते ही फत्तेखान विशाल सेना लेकर पुरंदर की ओर बढ़ चला।

क्या पुरंदर की प्राचीर फत्तेखान के प्रचंड आक्रमण को रोक पाएगी?

पूरी कहानी पढ़ें और जानिए स्वराज्य के इस निर्णायक संघर्ष का अगला अध्याय।


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फत्तेखान की सेना का बिखरना

फत्तेखान की सेना पूरी तरह तितर-बितर हो चुकी थी। जो गढ़ की तटबंदी तक पहुँच पाए, उनका वहीं अंत कर दिया गया। बाकी सैनिक जान बचाकर भागने लगे। चारों ओर विजय के स्पष्ट संकेत दिखाई दे रहे थे।

विजय के बीच बाजी पासलकर का रण में उतरना

तभी घोड़ों की टापों की आवाज़ सुनकर राजे पीछे मुड़े। बाजी घोड़े पर सवार थे।

‘बाजी, आप सवार क्यों हुए ?’

‘राजे, सारी उम्र रणभूमि में लड़ते हुए बीती है। स्वराज्य की पहली लड़ाई में बैठकर कैसे रहूँ ? पूरा विजय हासिल करके ही घर लौटूँगा।’

राजे कुछ कहते, उससे पहले ही बाजी ने घोड़े को एड़ लगा दी। बाजी को गढ़ से बाहर निकलते देख मराठा सैनिकों में नया जोश भर गया।

बाजी पासलकर का आदिलशाही सेना पर धावा

फत्तेखान अपने बिखरते सैनिकों को संभालकर मोर्चा जमाने का प्रयास कर रहा था। तभी बाजी पासलकर ने आदिलशाही सेना पर जोरदार धावा बोल दिया। दोनों पक्षों के योद्धा प्राणों की बाजी लगाकर लड़ रहे थे।

गोदाजी जगताप और मुसेरखान का आमना-सामना

फत्तेखान का दाहिना हाथ माना जाने वाला मुसेरखान पूरी ताकत से युद्ध कर रहा था। वह देखते ही गोदाजी जगताप सीधे उसकी ओर बढ़े। गोदाजी ने भाला फेंका, जो मुसेरखान की जांघ में जा धँसा।

क्रोध से उन्मत्त मुसेरखान ने भाला खींचकर बाहर निकाला और उसे दो टुकड़ों में तोड़कर दूर फेंक दिया। फिर तलवार हाथ में लेकर वह गोदाजी पर टूट पड़ा।

गोदाजी ने भी डटकर मुकाबला किया। युद्ध के बीच उन्हें जैसे ही सही अवसर का लाभ उठाते हुए, गोदाजी की तलवार तेजी से खान के कंधे पर जा लगी। मुसेरखान रक्त से लथपथ होकर गिर पड़ा।

मुसेरखान के गिरते ही टूटा फत्तेखान का मनोबल

मुसेरखान को गिरते देख फत्तेखान का बचा-खुचा मनोबल भी टूट गया। फत्तेखान भागने लगा।

भागते हुए शत्रु को देखकर बाजी पासलकर गरज उठे, ‘एक भी शत्रु बचकर नहीं जाना चाहिए ! मावल की धरती में घुसा दुश्मन सुरक्षित वापस नहीं लौटता—यह बात समझने दो !’

विजय के उत्साह से भरे मराठा सैनिक खान की सेना के पीछे दौड़ पड़े। बेलसर की छावनी तक उसका पीछा और शत्रु सैनिकों का संहार होता गया। मराठा सेना ने सीधे छावनी पर धावा बोल दिया।

गढ़ में लौटी विजय की खबर

गढ़ से खान का पीछा करती मराठा सेना दिखाई दे रही थी। सैनिकों का दल आँखों से ओझल हो गया। राजे आनंद के साथ लौट आए। पूरे गढ़ में विजय का उत्सव जैसा वातावरण था।

बाजी पासलकर, जगताप, काटे और इंगळे जैसे वीरों के स्वागत की तैयारी में राजे व्यस्त थे।

विजय के अगले दिन गढ़ की तलहटी में सेना

अगले दिन सूर्य ऊपर चढ़ आया। खळत-बेलसर की भीषण लड़ाई के बाद मराठा सेना गढ़ की तलहटी में पहुँची। राजे बुरुज पर खड़े होकर लौटते हुए सैनिकों के दलों को देख रहे थे।

राजे उनका स्वागत करने के लिए आगे बढ़े। सबसे पहले गोदाजी जगताप सामने आए।

‘गोदाजी ! लड़ाई जीत ली, है ना ?’

‘हाँ !’ गोदाजी ने कहा।

किसी के चेहरे पर विजय की खुशी नहीं थी। राजे ने पूछा,

‘क्या हुआ ?’

‘बाजी घायल हो गए हैं !’

पालखी में घायल बाजी को देखकर राजे स्तब्ध

राजे का ध्यान पीछे से आती एक पालखी पर गया। पालखी को जमीन पर रखा गया। राजे आगे की ओर दौड़ पड़े।

बाजी की आँखें बंद थीं और पूरा अंगरखा खून से भीगा हुआ था। सिर के सफेद बाल बिखरे हुए थे। माथे पर लगी चोट से रक्त की धार बह रही थी। सफेद मूँछों के गुच्छे उनके काँपते होंठों की हलचल के साथ थरथरा रहे थे।

राजे ने उन्हें पुकारा,

‘बाजी !’

बाजी ने आँखें खोलीं। राजों को देखते ही उनके चेहरे पर मुस्कान खिल उठी। राजों का हाथ थमकर कहा,

‘राजे, हमारी विजय हुई !’

बाजी पासलकर की आखिरी इच्छा

राजे ने बाजी का हाथ अपने हाथों में थाम लिया। वे बोले,

‘बाजी, यह क्या कर डाला आपने ? हमारी विजय तो निश्चित थी। फत्तेखान कहाँ जाने वाला था ? क्यों अपने प्राणों को संकट में डाल दिया ?’

राजे अपने आँसू रोक नहीं पा रहे थे। बाजी ने कहा,

‘राजे ! विजय प्राप्त हुई है। फिर इसमें बुरा क्या हुआ ? मैं अब वृद्ध हूँ। ऐसा अंत माँगने से भी नहीं मिलता। हँसिए, राजे ! आपका हँसता हुआ चेहरा देखने के लिए ही मेरे प्राण अब तक ठहरे हुए हैं। बस यही एक इच्छा बाकी रह गई है।’

राजे मुस्कुरा दिए। राजे के चेहरे पर वह मुस्कान देखते ही बाजी के चेहरे पर संतोष छा गया। वे मुस्कुराते रहे… और उसी मुस्कान के साथ उनकी गर्दन झुक गई।

विजय के चंद्रमा के साथ खो गई चंद्रकोर

राजे ने बाजी के शरीर पर शेला ओढ़ाया। आँसू पोंछते हुए वे उठे और गोदाजी से बोले,

‘गोदाजी ! प्रतिपदा का विजय-चंद्रमा तो हमारे घर आया है… लेकिन जो चंद्रकोर हमने खो दी है, उसे फिर कभी नहीं देख पाएँगे। पूर्णिमा के चाँद में भी उसकी कमी हमेशा महसूस होती रहेगी।’


फत्तेखान की हार के बाद स्वराज्य का उत्साह बढ़ा, लेकिन विजय की कीमत भारी थी।

बाजी पासलकर की शहादत ने राजे को भीतर तक झकझोर दिया।

एक वीर चला गया, पर उसकी आखिरी मुस्कान अमर हो गई।


रणभूमि के वीर

  • बाजी पासलकर – स्वराज्य के अनुभवी वीर, जिन्होंने विजय के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी।
  • छत्रपति शिवाजी महाराज – स्वराज्य के नेतृत्वकर्ता, जिनके सामने बाजी ने अपनी अंतिम इच्छा व्यक्त की।
  • गोदाजी जगताप – रणभूमि में मुसेरखान से भिड़कर उसे परास्त करने वाले वीर योद्धा।
  • फत्तेखान – आदिलशाही सेना का सेनापति, जिसकी सेना को मराठों के प्रचंड प्रतिरोध का सामना करना पड़ा।
  • मुसेरखान – फत्तेखान का प्रमुख योद्धा, जिसका गोदाजी जगताप से भीषण युद्ध हुआ।

खळत-बेलसर की लड़ाई का ऐतिहासिक महत्व

खळत-बेलसर के युद्ध प्रसंग में मराठा वीरों के साहस, युद्धकौशल और स्वराज्य के प्रति समर्पण का चित्रण मिलता है। बाजी पासलकर का बलिदान और शिवाजी महाराज के साथ उनका अंतिम संवाद इस प्रसंग को भावनात्मक रूप से विशेष बनाता है।


इस प्रसंग से मिलने वाली सीख

  • बाजी पासलकर का बलिदान सिखाता है कि विजय केवल युद्ध जीतने का नाम नहीं, बल्कि अपने उद्देश्य के लिए साहस, निष्ठा और त्याग के साथ खड़े रहने का नाम भी है।
  • उनकी अंतिम इच्छा समर्पण और स्वराज्य-निष्ठा का भाव दिखाती है।

विजय मिली, लेकिन एक चंद्रकोर खो गई

खळत-बेलसर की विजय ने मराठा सेना का उत्साह बढ़ाया, लेकिन बाजी पासलकर के बलिदान ने इस जीत को भावुक कर दिया। शिवाजी महाराज के शब्द उस अपूरणीय क्षति की गहराई दिखाते हैं।


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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

बाजी पासलकर ने युद्ध में दोबारा घोड़े पर क्यों सवारी की?

उन्होंने स्वराज्य की पहली लड़ाई में पीछे रहना स्वीकार नहीं किया और पूर्ण विजय के लिए रणभूमि में उतरने का निर्णय लिया।

गोदाजी जगताप ने किस योद्धा से युद्ध किया?

गोदाजी जगताप का मुसेरखान से भीषण मुकाबला हुआ, जिसमें उन्होंने उसे परास्त कर दिया।

बाजी पासलकर ने शिवाजी महाराज से अंतिम समय में क्या कहा?

बाजी ने अपनी विजय की खुशी व्यक्त की और शिवाजी महाराज से मुस्कुराने का आग्रह किया, क्योंकि उनका हँसता चेहरा देखना उनकी अंतिम इच्छा थी।