
शिवाजी राजे शांत थे, पर उनकी मुस्कान किसी गहरे रहस्य की ओर संकेत कर रही थी। हर कदम के साथ पर्दा उठने वाला था।
पिलाजी और संकराजी के मन में एक ही प्रश्न था—बिना युद्ध, बिना शोर, पुरंधर पर अधिकार कैसे हुआ? उत्तर सबको चौंका देगा।
पिछले लेख में?
पिछले लेख में हमने पढ़ा की राजनीति, विश्वास और रिश्तों के बीच एक ऐसी रात आई, जब एक निर्णय ने पुरंधर का भविष्य बदल दिया। मित्रता के पीछे छिपी चाल किसी ने नहीं पहचानी।
निलोजी का अहंकार और शिवाजी महाराज की धैर्यपूर्ण नीति आमने-सामने आई। बिना तलवार उठाए ऐसा दांव चला, जिसने सबको स्तब्ध कर दिया।
उधर रानी सईबाई के साथ पड़वा का भावुक क्षण, और इधर पुरंधर के भाग्य का अंतिम फैसला—एक ही रात में इतिहास नई दिशा लेने वाला था।
अब जानिए, उसी कहानी का रोमांचक अध्याय, जहाँ असली खेल शुरू होता है।
लेख का विस्तृत सारांश
१-४
राजे और रानी सईबाई के बीच शतरंज की दिलचस्प शुरुआत
राजे खुलकर हँसे।
‘सई ! हम खुश है आप पर। जो चाहो मांगो।’
‘सच ? देखो, पीछे हट जाओगे !’
‘बिल्कुल नहीं।’
‘आज पड़वा है। बहुत दिनों से हम ने शतरंज नहीं खेला। चलो आज खेलते हैं !’
‘बस, इतना ही ? शतरंज की बिसात बिछाइए।’
राजे वस्त्र बदलकर लौटे, तब तक रानी सईबाई ने कालीन पर शतरंज की बिसात सजा दी थी। रजत दीपक प्रज्वलित कर दिए गए। दोनों ओर आराम के लिए गद्देदार आसन रखे गए। राजे आकर अपने स्थान पर विराजमान हुए। बिसात पूरी तरह सज चुकी थी। रानी सईबाई ने कहा,
‘मुझे काली बिसात नहीं चाहिए, हस्तिदंत की बिसात चाहिए।’
‘आरंभ से ही रोना शुरू हो गया ?’
‘होने दीजिए।’
शतरंज की बाजी और रानी सईबाई की अनोखी बात
खेल प्रारंभ हुआ। रात गहराती गई और रानी सईबाई ऊबने लगीं। लंबी जम्हाई लेते हुए और आलस्य से अंगड़ाई भरकर वे बोलें,
‘खेल यहीं समाप्त करें !’
‘समाप्त होने से पहले ही ?’
‘आप जीतें या हम जीतें, दोनों एक ही बात है। व्यर्थ ही रात भर जागना पड़ेगा !’
‘अच्छी बात है ! खेलने का आग्रह तो आपने ही किया था। पर सई, यह आदत ठीक नहीं।’
‘आप हमेशा पारी के बीच में इसी तरह उठते हैं।’
‘रानी है ना हम !’
राजाओं ने प्रशंसा से देखा और रानी सईबाई के खुलकर हंसने से महल भर गया।
दीपावली की सुबह पुरंधर किले की ओर प्रस्थान
अगली सुबह मां साहब से आशीर्वाद लेकर राजे, पिलाजी और संकराजी के साथ पुरंधर की ओर प्रस्थान कर गए। वातावरण में दीपावली की ठंडक थी। भोर की ओस से मार्ग भूरा हुआ था। हल्के कुहासे के बीच दूर खड़ा पुरंधर किला धुंधली छवि-सा दृष्टिगोचर हो रहा था। धुंध की चादरें पर्वतों की दरारों और ढलानों से लिपटी हुई थीं।
राजे पहली माची पर घोड़े से उतरे। पिलाजी और संक्राजी के साथ प्रसन्नचित्त होकर वे किले की चढ़ाई करने लगे।
पुरंधर के द्वार पर लहराता रहस्यमयी भगवा ध्वज
किले का मुख्य द्वार सामने आ गया। जैसे ही दोनों भाइयों की दृष्टि द्वार पर पड़ी, वे विस्मित रह गए। द्वार के बाहर आदिलशाही का चाँद-तारा नहीं था। उसकी जगह भगवा ध्वज लहरा रहा था।
दोनों भाई विचारों में डूबे हुए मुख्य द्वार तक पहुँचे। राजे के आगमन का समाचार देने के लिए नगाड़े गूँज उठे। तानाजी और नेताजी आगे बढ़कर उपस्थित हुए और आदरपूर्वक अभिवादन किया।
राजे का रहस्यमयी उत्तर सुनकर सभी रह गए स्तब्ध
राजे ने कहा, ‘सब ठीक है ना ?’
‘जी ! सब कुछ आदेशानुसार हुआ।’ मुरारजी ने कहा।
‘शाबाश ! और येसाजी कहाँ हैं ?’
‘वे दारू-भंडार की चौकी पर हैं।’
‘चलिए !’
‘राजे, ये पहरेदार किसके हैं ?’ संकराजी चिल्लाए।
शांत भाव से राजे ने कहा, ‘हमारे।’
‘इसका अर्थ ?’ पिलाजी ने पूछा।
क्या पुरंधर का सबसे बड़ा रहस्य अब सामने आएगा?
पुरंधर के द्वार पर लहराता भगवा ध्वज देखकर पिलाजी और संकराजी स्तब्ध रह गए।
राजे की रहस्यमयी मुस्कान बता रही थी कि बिना तलवार उठाए भी एक बड़ी विजय प्राप्त हो चुकी है।
लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न अभी भी अनुत्तरित था—आखिर यह सब हुआ कैसे?
अगले भाग में जानिए, शिवाजी महाराज ने ऐसी कौन-सी गुप्त योजना बनाई जिसने बिना युद्ध पुरंधर का इतिहास बदल दिया।
प्रमुख पात्र और उनका परिचय
- छत्रपति शिवाजी महाराज – दूरदर्शी, साहसी और अद्भुत रणनीतिकार, जिन्होंने बुद्धि, धैर्य और नेतृत्व से असंभव को संभव बनाया।
- रानी सईबाई – शिवाजी महाराज की धर्मपत्नी, जिनकी सरलता, प्रेम और समझदारी राजे के जीवन की सबसे बड़ी शक्ति थी।
- पिलाजी और संकराजी – निलोजी के भाई, जो किले पर हुए इस रहस्यमयी परिवर्तन को देखकर आश्चर्यचकित रह गए।
पुरंधर विजय का ऐतिहासिक महत्व
पुरंधर किला मराठा साम्राज्य की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण दुर्गों में से एक था। इस घटना ने यह सिद्ध किया कि छत्रपति शिवाजी महाराज केवल रणभूमि के योद्धा ही नहीं, बल्कि अद्वितीय रणनीतिकार भी थे। उन्होंने कई बार रक्तपात के बजाय बुद्धिमत्ता, विश्वास और गुप्त योजनाओं के माध्यम से विजय प्राप्त की। पुरंधर पर भगवा ध्वज का फहराना मराठा स्वराज्य के विस्तार, आत्मविश्वास और राजनीतिक दूरदर्शिता का प्रतीक बना। यह घटना दर्शाती है कि सच्ची विजय केवल तलवार से नहीं, बल्कि धैर्य, योजना और सही समय पर लिए गए निर्णयों से भी प्राप्त की जा सकती है।
इस प्रेरणादायक घटना से मिलने वाली सीख
- यह प्रसंग हमें सिखाता है कि हर संघर्ष का समाधान केवल शक्ति से नहीं होता।
- बुद्धिमानी, धैर्य और सही रणनीति कई बार सबसे बड़ी जीत दिलाती है।
- शिवाजी महाराज ने परिस्थितियों को समझकर ऐसा निर्णय लिया जिससे अनावश्यक रक्तपात टल गया और लक्ष्य भी प्राप्त हुआ।
- जीवन में भी यदि हम भावनाओं के बजाय विवेक से निर्णय लें, लोगों का विश्वास जीतें और सही अवसर की प्रतीक्षा करें, तो कठिन से कठिन लक्ष्य भी आसानी से प्राप्त किए जा सकते हैं।
- सच्चा नेतृत्व वही है जो कम से कम नुकसान में सबसे बड़ी सफलता हासिल करे।
बुद्धिमत्ता की वह जीत जिसने इतिहास बदल दिया
पुरंधर का यह प्रसंग छत्रपति शिवाजी महाराज की असाधारण दूरदर्शिता और नेतृत्व क्षमता का जीवंत प्रमाण है। एक ओर रानी सईबाई के साथ उनका स्नेहपूर्ण व्यवहार दिखाई देता है, तो दूसरी ओर राज्य संचालन में उनकी अद्भुत रणनीति। यही संतुलन उन्हें महान शासक बनाता है। आने वाला भाग इस रहस्य से पर्दा उठाएगा कि आखिर बिना युद्ध पुरंधर पर भगवा ध्वज कैसे लहराया।
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