
खंडहरों में बदल चुके पुणे की वीरान धरती पर जब बालक शिवाजी ने कदम रखा, तब चारों ओर सिर्फ टूटी दीवारें, उजड़ी हवेलियाँ और डर से सहमे लोग दिखाई दे रहे थे। ऐसा लगता था मानो इस शहर की सांसें ही थम चुकी हों।
लेकिन रानी जिजाबाई की आँखों में एक अलग ही सपना जल रहा था। उन्होंने उस उजड़े हुए पुणे में भविष्य का स्वराज्य देखा था।
दादोजी कोंडदेव के मार्गदर्शन में धीरे-धीरे नई शुरुआत होने लगी।
तभी एक दिन नदी किनारे ईंटों के ढेर के नीचे से एक अद्भुत और अखंड गणेश मूर्ति मिली।
उस क्षण ने सबके मन में यह विश्वास जगा दिया कि यह भूमि फिर से जाग उठेगी।
उसी स्थान पर मंदिर बनाने का निर्णय हुआ और पास ही बनने लगा वह रहस्यमयी वाड़ा, जिसे आगे चलकर “लाल महल” कहा गया।
पर सवाल अभी भी बाकी था—क्या यह केवल एक वाड़ा था, या स्वराज्य की पहली धड़कन?
पुणे की इस खामोश धरती में आखिर कौन-सा भविष्य छिपा था, जिसे केवल रानी जिजाबाई और शिवबा देख पा रहे थे?
पिछले लेख में?
पिछले लेख में हमने पढ़ा की शिवनेरी दुर्ग की हवाओं में एक अजीब सा सन्नाटा था।
वर्षों की पीड़ा, युद्ध और प्रतीक्षा के बाद भी रानी जिजाबाई की आंखों में केवल एक ही सपना जीवित था।
अपने पुत्र को ऐसा योद्धा बनाना जो अन्याय के सामने कभी झुके नहीं।
तभी बीजापुर से एक संदेश आता है, जो उनके जीवन की दिशा बदल देता है।
शहाजी महाराज ने पुणे की जागीर प्राप्त की थी और उनके सबसे विश्वासपात्र साथी दादोजी कोंडदेव स्वयं रानी जिजाबाई और बाल शिवाजी को लेने आए थे।
लेकिन इस यात्रा के पीछे केवल जागीर नहीं, बल्कि राजनीति, विश्वासघात और भविष्य में जन्म लेने वाले स्वराज्य का रहस्य छिपा था।
जब रानी जिजाबाई ने अंतिम बार शिवनेरी की ओर देखा, तब किसी को अंदाजा नहीं था कि यही बालक आगे चलकर इतिहास बदल देगा।
आखिर पुणे की उस यात्रा में ऐसा क्या था जिसने एक साधारण बालक को छत्रपति बनने की राह पर खड़ा कर दिया?
लेख का विस्तृत सारांश
९-१
उजड़े पुणे में शिवाजी राजे का प्रवेश
दोपहर ढलने के बाद शिवाजी राजे ने खंडहर हुए पुणे में प्रवेश किया। ऐसा लग रहा था जैसे किसी प्राचीन शहर में प्रवेश कर रहे हों। दुर्ग की ढह चुकी बुर्जें एक समय के वैभव की कहानी कह रही थीं। जगह-जगह ढही हुई इमारतें दिखाई दे रही थीं। उन पर घनेरी की झाड़ियाँ उग आई थीं। उनकी लाल-पीली फूलें जीवन की याद दिला रही थीं। हवेली के उजड़े हुए अवशेष एक समय की शान की निशानी थे।
डरे हुए लोग और पहली बातचीत
गाँव की नदी किनारे झोपड़ियों में बसे लोग जरूरी और उपयोगी समान के साथ आए हुए लोगों से भयभीत हो गए थे। दूर से वे डर भरी नजरों से यात्रियों के समूह को देख रहे थे। एक खाली जगह पर पहुँचते ही पंत ने हाथ उठाकर इशारा किया। यात्रियों का समूह रुक गया। पालकी से रानी जिजाबाई उतरीं। दासियाँ इकट्ठा हो गईं। बैलों से सामान उतारा जाने लगा। शिवाजी राजे आसपास की उजड़ी, भग्न इमारतों को देख रहे थे। उन्होंने पूछा,
‘माँ साहब, यही पुणे है ?’
‘हाँ !’
‘यहाँ तो हमारे सिवा कोई नहीं दिखता।’
‘बुलाया, तो सब आ जाएंगे।’
‘रहना कहाँ है ? कहाँ है वाड़ा ?’
‘वाड़ा देखकर नहीं रहते, राजे ! बड़े लोग वाड़े बनाकर रहते हैं।’
नई शुरुआत और पहला दीपक
शामियाना लगाया गया। चारों ओर झोपड़ियाँ बन गईं। मूलामुठे के संगम का पानी डूबते सूरज की किरणों में चमक रहा था। जागीर के वारिस ने उजड़ी हुई इमारत पर पहला दीपक जलाया था।
दादोजी कोंडदेव के सामने भविष्य का पुणे दिख रहा था। दादोजी के साथ शिवाजी राजे घूम रहे थे। डरे हुए लोग इकट्ठा हो गए थे।
गणेश जी की खोज
एक दिन शिवबा दौड़ता हुआ आया।
‘माँ साहब, पंत को देवता मिल गया।’
‘कहाँ ?’
‘नदी के पास।’
जिजामाता उठीं। दासियों के साथ रानी जिजाबाई जा रही थीं। शिवबा रास्ता दिखा रहा था। रानी जिजाबाई को आते देख सब अदब से खड़े हो गए; किनारे हो गए। पंत के चेहरे पर खुशी थी। ईंटों के ढेर के नीचे छिपा गणेश बाहर आ गया था। मूर्ति सुंदर थी; अखंड थी। रानी जिजाबाई ने हाथ जोड़ लिए। पंत बोले,
‘माँ साहब ! शुरुआत तो अच्छी हुई।’
‘हाँ, पंत, इसी जगह पर सुंदर मंदिर बनाओ।’
पंत ने सहमति दी और कहा, ‘लेकिन, मासाहब, अभी वाड़े की जगह तय नहीं हो रही है।’
‘वाड़े की जगह मंदिर के पास ही होनी चाहिए।’
लाल महल की नींव
वाड़े की योजना बनाई गई। भूमि पूजन के बाद दादोजी कोंडदेव ने वाड़े की जगह पर पहली कुदाल चलाई। दौलत के मालिक के लिए एक ही वाड़ा होना दादोजी को स्वीकार नहीं था। सुरक्षा की दृष्टि से भी यह उचित नहीं था। उन्होंने खेडबारे खोर को दूसरी बस्ती के लिए चुना। वाड़े के लिए जगह चुनी। गाँव की सीमा निर्धारित की… और खेडबारे में दूसरे वाड़े का निर्माण शुरू हुआ। परगना के हवलदार के रूप में बापूजी मुद्गल नरहेकर को नियुक्त किया गया।
बरसात का मौसम आया। तब पंत को शिवाजी राजे और रानी जिजाबाई के निवास की चिंता हुई। नरहेकर ने यह चिंता दूर की। उनका खेडबारे में वाड़ा था; उन्होंने वह दे दिया। शिवबा रानी जिजाबाई के साथ खेडबारे में रहने लगे। पंत के साथ पुणे-खेडबारे की यात्राएं होती रहती थीं। नए उठने वाले वाड़े, बनने वाली बस्तियों को वह देखते थे। शास्त्रीबुवा के पास सुबह-शाम पढ़ाई करते थे। समय मिलने पर माँ को रामायण-महाभारत पढ़कर सुनाते थे।
पुणे का पुनर्निर्माण
वाड़े बनाए जा रहे थे। कुएं पानी की तलाश में खुदाई जा रहे थे। पुणे-खेडबारे में सैकड़ों लोग इस काम में लगे थे। मुल्क के राजमिस्त्री, बढ़ई, बारह बलुतेदार यह खबर सुनकर पुणे-खेडबारे की ओर दौड़ रहे थे। काम के जरूरतमंद लोग आ रहे थे।
लाल महल का निर्माण
खेड और पुणे के वाड़े तैयार हो गए। कुओं में पर्याप्त पानी मिला। खेड की तुलना में पुणे का वाड़ा ऊंचा और सुंदर था। दो विशाल आंगनों के साथ दीवानखाना था। खास दीवानखाना था। रानीवास के महल थे। कोठी, रसोईघर थे। सुंदर देवघर था। इसके अलावा अस्तबल, गोशाला थी, जो अलग थी। वाड़े की इमारत के साथ-साथ गाँव की इमारतें भी बनाई जा रही थीं। दादोजी ने पुणे के वाड़े का नाम ‘लाल महल’ रखा। लाल महल के पास ही ‘श्रीगजानन मंदिर’ था।
शिवाजी राजे पुणे के वाड़े में आए। दादोजी ने फड़ के चुनिंदा लोगों को इकट्ठा किया। अस्तबल सजाया गया। लेकिन गाँव के वतनदार, हकदार बाहर ही थे। दादोजी ने उन्हें बुलावा भेजा।
आगे की कहानी?
लाल महल अब तैयार हो चुका था। उजड़ा हुआ पुणे फिर से साँस लेने लगा था। लोगों की आँखों में उम्मीद लौट रही थी। लेकिन दादोजी कोंडदेव की गंभीर नजरें दूर भविष्य को देख रही थीं। उन्हें पता था कि यह सिर्फ एक वाड़ा नहीं, बल्कि आने वाले स्वराज्य की पहली नींव है।
उस रात लाल महल के दीपकों की रोशनी में बाल शिवाजी की आँखों में एक अलग ही चमक थी। जैसे वह इस धरती से कोई मौन वचन ले रहे हों। पर किसी को क्या पता था कि यही पुणे आने वाले समय में मुगलों और आदिलशाही की नींद उड़ाने वाला केंद्र बनेगा। आखिर उस छोटे से बालक के मन में कौन-सा तूफान जन्म ले रहा था, जो इतिहास बदलने वाला था?
प्रमुख पात्र और उनका परिचय
- छत्रपति शिवाजी महाराज – बाल शिवाजी बचपन से ही तेजस्वी, साहसी और दूरदर्शी थे। उजड़े पुणे को देखकर भी उनके मन में भय नहीं, बल्कि नया स्वराज्य बसाने का सपना जाग उठा। यही बालक आगे चलकर हिंदवी स्वराज्य का निर्माता बना।
- राजमाता जिजाबाई – रानी जिजाबाई केवल माँ नहीं, बल्कि शिवाजी महाराज के विचारों की प्रेरणा थीं। उन्होंने वीरता, धर्म और न्याय के संस्कार शिवबा को दिए। उजड़े पुणे में भी उन्होंने भविष्य का स्वर्णिम स्वराज्य देखा।
- दादोजी कोंडदेव – दादोजी कोंडदेव एक कुशल प्रशासक और दूरदर्शी मार्गदर्शक थे। उन्होंने पुणे को दोबारा बसाने और शिवाजी महाराज के व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लाल महल का निर्माण उनकी योजना का परिणाम था।
- बापूजी मुद्गल नरहेकर – बापूजी मुद्गल नरहेकर ने कठिन समय में रानी जिजाबाई और शिवबा को सहारा दिया। उन्होंने अपना वाड़ा देकर स्वराज्य की नींव मजबूत करने में सहयोग किया। उनकी निष्ठा और सेवा उल्लेखनीय थी।
लेख का ऐतिहासिक महत्व
पुणे का पुनर्निर्माण मराठा इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक माना जाता है। उजड़ी हुई भूमि पर लाल महल का निर्माण केवल एक निवास नहीं था, बल्कि हिंदवी स्वराज्य की शुरुआत थी। यहीं बाल शिवाजी ने राजनीति, युद्धनीति और प्रशासन के प्रारंभिक संस्कार प्राप्त किए। श्रीगजानन मंदिर की स्थापना ने धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना को बल दिया। आगे चलकर यही पुणे मराठा साम्राज्य का प्रमुख केंद्र बना और इतिहास में अमर हो गया।
इस लेख से मिलने वाली प्रमुख सीख
- यह कहानी सिखाती है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, दृढ़ संकल्प और सही मार्गदर्शन से नई शुरुआत की जा सकती है।
- जिजाबाई का विश्वास, दादोजी की दूरदर्शिता और शिवाजी का साहस हमें प्रेरित करता है कि उजड़े हुए हालातों में भी भविष्य का निर्माण संभव है।
- सफलता हमेशा बड़े संसाधनों से नहीं, बल्कि मजबूत इरादों और आत्मविश्वास से जन्म लेती है।
निष्कर्ष
खंडहर बने पुणे में शिवाजी महाराज का प्रवेश केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं था, बल्कि स्वराज्य के उदय का प्रारंभ था। लाल महल, श्रीगजानन मंदिर और नई बसाहट ने उस भविष्य की नींव रखी, जिसने आगे चलकर मराठा साम्राज्य को जन्म दिया। यह कहानी साहस, विश्वास और पुनर्निर्माण की अमर प्रेरणा है।
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